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संपादकीय: कारवां गुजर गया

आज भी लोगों के दिलो-दिमाग में गूंजने वाले उनके मशहूर गीतों में से एक ‘कारवां गुजर गया...’ का दिलचस्प किस्सा यह था कि यह गीत उन्होंने एक बार लखनऊ रेडियो पर सुनाया था। इस गीत के बाद ही उन्हें बॉलीवुड से बुलावा आया था।

Author July 21, 2018 1:47 AM
गोपाल दास नीरज (फाइल फोटो)

हिंदी फिल्मों की दुनिया में न जाने कितने गीत लिखे गए होंगे, लेकिन जिंदा वही रहे, जो सुनने वालों के दिल में ठहर गए, बस गए। गोपाल दास नीरज की लिखी कविताएं और गीत पीढ़ियों का सफर तय करते हुए अगर आज भी बहुत सारे लोगों के दिलो-दिमाग में कायम हैं, तो इससे उन गीतों में बसी जिंदगी के अहसासों का अंदाजा लगाया जा सकता है। यह बेवजह नहीं है कि गुरुवार को जब उनके निधन की खबर आई तो एक सिरे से पुरानी पीढ़ी के बुजुर्ग से लेकर नई पीढ़ी के युवा तक उनके जाने पर एक कोना खाली हो जाने जैसा महसूस करने लगे। कविता से शुरू हुआ उनका सफर बॉलीवुड के परदे पर उतरे उनके गीतों में उसी संवेदना और गहराई के साथ मौजूद रहा। जाहिर है, सुनने वाले के लिए उनके गीत दिल के बेहद करीब… कुछ अपना जैसा होते थे।

अपने लेखन के शुरुआती दौर में कविता लिखते हुए वे हरिवंशराय बच्चन से प्रेरित हुए, इसलिए कुछ समय तक उनके असर में जरूर रहे। लेकिन कुछ ही समय बाद जब अपनी अलग और खास शैली में लिखने लगे तो वह उनकी पहचान भी बन गई। इस पहचान से लैस बॉलीवुड में ऐसे तमाम गीतों पर उनके नाम दर्ज हैं, जो खूब लोकप्रिय रहे और लोग आज भी उन्हें मौके-बेमौके गुनगुनाते रहते हैं। उनकी कलम से निकल कर परदे पर गूंजने वाले उनके गीतों के लिए उन्हें तीन बार फिल्मफेयर पुरस्कार से भी नवाजा गया। वे कहते थे कि मेरी भाषा प्रेम की भाषा है। मगर प्रेम, विरह, खुशी, दुख, लोगों के जीवन से जुड़ी तकलीफें, जटिलताएं- आम जिंदगी की सभी तस्वीरें उनके गीतों के फ्रेम में जिंदा झलकती हैं।

आज भी लोगों के दिलो-दिमाग में गूंजने वाले उनके मशहूर गीतों में से एक ‘कारवां गुजर गया…’ का दिलचस्प किस्सा यह था कि यह गीत उन्होंने एक बार लखनऊ रेडियो पर सुनाया था। इस गीत के बाद ही उन्हें बॉलीवुड से बुलावा आया था। पैदा होने के बाद इंसान को जिन दुनियावी अहसासों-झंझावातों, खुशी या दुख के अहसासों से गुजरना पड़ता है, उससे उठे संवेदनाओं के झोंकों को कई बार वह शब्द देना चाहता है, अपने आसपास से बांटना चाहता है। ऐसे में अक्सर कुछ कविताएं, कुछ गीत उसके साथ हो जाते हैं और भावनात्मक उथल-पुथल का सहारा बनते हैं। नीरज ऐसे हर मौके पर अपने शब्दों के साथ खड़े मिले। दुनिया की मजहबी दीवारों से परे समाज में साझी विरासत और गंगा-जमुनी तहजीब को बचाए रखने की अपील करने वाले इंसानियत और संवेदनाओं के कवि और गीतकार नीरज की कमी हमेशा खलेगी।

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