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बस में बर्बरता

पंजाब के मोगा जिले में चलती बस में मां-बेटी के साथ यौनहिंसा की कोशिश ने एक बार फिर सोलह दिसंबर 2012 की दिल्ली की घटना के जख्म को हरा कर दिया। ताजा घटना में अपनी मंशा में अपराधी कामयाब नहीं हुए, लेकिन एक तरह से उन्होंने लड़की की हत्या कर दी। विडंबना यह है कि […]
Author May 2, 2015 08:12 am

पंजाब के मोगा जिले में चलती बस में मां-बेटी के साथ यौनहिंसा की कोशिश ने एक बार फिर सोलह दिसंबर 2012 की दिल्ली की घटना के जख्म को हरा कर दिया। ताजा घटना में अपनी मंशा में अपराधी कामयाब नहीं हुए, लेकिन एक तरह से उन्होंने लड़की की हत्या कर दी। विडंबना यह है कि इस मां और बेटी के साथ कंडक्टर और उसके तीन साथी छेड़खानी करते रहे, लड़की और उसके भाई के शोर मचाने और अपनी मंशा में विफल रहने पर मां-बेटी को चलती बस से बाहर धकेल दिया और बाकी यात्री यह सब चुपचाप देखते रहे। दिल्ली में निर्भया मामले में ऐसी ही संवेदनहीनता देखी गई थी, जब अपराधियों ने सामूहिक बलात्कार के बाद छात्रा को और साथ ही उसके मित्र को चलती बस से फेंक दिया था और आसपास से गुजरते लोगों ने तुरंत मदद करना जरूरी नहीं समझा। आखिर इसी वजह से उस छात्रा की जान चली गई। मोगा की ताजा घटना में भी वही हुआ। बस से धकेले जाने पर लड़की की जान चली गई। मां किसी तरह जिंदा बच सकी।

सवाल है कि कंडक्टर, ड्राइवर और उनके साथ के लोग कुछ यात्रियों के बस में होने के बावजूद ऐसी बर्बरता पर कैसे उतर आए? बस में मौजूद लोगों की संवेदनहीनता के अलावा इस सवाल का जवाब शायद यह भी है कि वह बस ‘आॅर्बिट एविएशन कंपनी’ की है और उसके मालिक पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के बेटे और राज्य के उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल हैं। बस के कंडक्टर और बाकी कर्मचारी इस कदर बेलगाम थे, तो यह केवल उनका क्षणिक पतन नहीं था; उनके मन में यह बात पैठी रही होगी कि उनके मालिक बहुत ताकतवर लोग है, वे कुछ भी करें उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा। यह घटना सुर्खियों में आ गई, लोकसभा में भी यह मुद््दा गूंजा। केंद्र ने पंजाब सरकार से इस घटना की रिपोर्ट मांगी है। पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने कहा है कि बस कंपनी उनके परिवार की है, हालांकि इसके कामकाज से वे ताल्लुक नहीं रखते। मगर वे अपनी जवाबदेही से पल्ला नहीं झाड़ सकते। दिल्ली में उबर कंपनी की एक टैक्सी में बलात्कार की घटना के बाद उस पूरी कंपनी पर पाबंदी लगा दी गई थी। तब गृह मंत्रालय ने यात्री की सुरक्षा सुनिश्चित कर पाने में विफलता के तर्क से उस प्रतिबंध को सही ठहराया था। इस आधार पर ‘आॅर्बिट एविएशन कंपनी’ पर पाबंदी की मांग उठी है तो इसमें क्या गलत है!

बलात्कार के मामलों में सजा की दर दूसरे अपराधों के बरक्स कम रही है। पर पंजाब में यह दर राष्ट्रीय औसत से भी कम है। अपराध रिकार्ड ब्यूरो के एक अध्ययन के मुताबिक पंजाब में बलात्कार के मामलों में सजा की दर महज ग्यारह फीसद है। बलात्कार के मुकदमे में बरी होने की ऊंची दर आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों का दुस्साहस और महिलाओं के सामने जोखिम को और बढ़ाती है। विडंबना यह है कि जब बलात्कार की कोई घटना चर्चा का विषय बन जाती है, तब सरकारें तमाम तरह के वादे करती हैं, समाज में भी हलचल मचती है, लेकिन कुछ ही दिनों बाद सब कुछ पहले जैसा चलने लगता है। आपराधिक तत्त्व बेखौफ रहते हैं। अपराध के वक्त आसपास मौजूद लोग मूकदर्शक बने रहते हैं। पुलिस-प्रशासन के रवैए में कोई खास फर्क नहीं आता। लेकिन खासकर निजी बसों में मुसाफिर ज्यादा असुरक्षित हैं तो इसलिए कि यह धंधा काफी हद तक माफियागिरी में बदलता गया है। सरकार चला रहे बादल परिवार को बसें चलाने का कारोबार करने की क्या जरूरत है!

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