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गठबंधन की गांठ

जम्मू-कश्मीर में भारतीय जनता पार्टी और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की साझा सरकार बनने के हफ्ते भर के भीतर गठबंधन का अंतर्विरोध एक बार फिर तीखे ढंग से उजागर हुआ है। अलगाववादी मसरत आलम को रिहा करने के फैसले से भाजपा सांसत में है। वहीं पीडीपी इस रिहाई को सही ठहरा रही है। यही नहीं, पीडीपी […]

जम्मू-कश्मीर में भारतीय जनता पार्टी और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की साझा सरकार बनने के हफ्ते भर के भीतर गठबंधन का अंतर्विरोध एक बार फिर तीखे ढंग से उजागर हुआ है। अलगाववादी मसरत आलम को रिहा करने के फैसले से भाजपा सांसत में है। वहीं पीडीपी इस रिहाई को सही ठहरा रही है। यही नहीं, पीडीपी ने यह तक कहा है कि आलम की रिहाई न्यूनतम साझा कार्यक्रम के अनुरूप है। यह सहयोगी दल के जले पर नमक छिड़कना नहीं तो और क्या है! ज्यादा वक्त नहीं बीता जब बिहार के अपने दौरे के दरम्यान भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव के मेल-मिलाप को अपवित्र गठबंधन करार दिया था। जबकि नीतीश और लालू कभी साथ थे और समान राजनीतिक-वैचारिक पृष्ठभूमि से वास्ता रखते हैं। शाह से पूछा जा सकता है कि भाजपा और पीडीपी का गठबंधन कैसा है! इसे सबने विरोधाभासों का गठजोड़ माना है। खुद मुफ्ती मोहम्मद सईद ने इसे दो ध्रुवों का मिलन कहा। मगर यह उम्मीद भी जताई जा रही थी कि हालात की मजबूरी से साथ आए दोनों दल अपने-अपने अतिवादी रुख में नरमी लाएंगे, और आखिरकार यह गठबंधन राज्य के साथ ही राष्ट्रीय हित में साबित होगा। मगर महजसात-आठ दिनों के अंदर सत्तारूढ़ गठबंधन के दोनों साझेदार कई बार एक-दूसरे के आमने-सामने खड़े नजर आए।

शपथग्रहण के साथ ही विवाद की शुरुआत हो गई, जब मुख्यमंत्री मोहम्मद सईद ने राज्य में शांतिपूर्वक चुनाव संपन्न होने के लिए अलगाववादियों के अलावा आतंकवादियों और पाकिस्तान का भी आभार जताया। दूसरा विवाद तब उठा जब पीडीपी के कुछ सांसदों ने अफजल गुरु की फांसी को गलत बताते हुए उसके अवशेष उसके परिवारवालों को सौंपने की मांग की। अभी इस पर हंगामा शांत भी नहीं हुआ था कि आलम की रिहाई ने भाजपा-पीडीपी के बीच फिर से तनाव पैदा कर दिया है। आलम को 2010 में हुए विरोध-प्रदर्शनों को भड़काने का जिम्मेवार मानते हुए देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने के आरोप में पकड़ा गया था। पीडीपी का कहना है कि राजनीतिक बंदियों को रिहा करने पर भाजपा से सहमति बनी थी और उसी के तहत आलम को छोड़ा गया। जबकि भाजपा के मुताबिक इस मुद््दे पर कोई रजामंदी नहीं, सिर्फ चर्चा हुई थी। जो हो, सईद के इस फैसले के कारण भाजपा विपक्ष के निशाने पर आने के साथ ही अपने सहयोगियों की भी आलोचना झेल रही है। ऐसा लगता है कि भाजपा से गठबंधन के चलते घाटी में सियासी नुकसान का अनुमान कर पीडीपी कुछ ऐसे कदम उठाने की उतावली में है जिनसे वह जता सके कि उसने अपने एजेंडे से समझौता नहीं किया है।

दूसरी ओर, पहले ही धारा 370 को ठंडे बस्ते में डालने के लिए राजी हो चुकी भाजपा भी आशंकित है कि सईद के विवादास्पद फैसलों का खमियाजा उसे भुगतना पड़ सकता है। गौरतलब है कि उसने पीडीपी से गठबंधन की बातचीत तब तक परिणति तक नहीं पहुंचने दी जब तक दिल्ली के विधानसभा चुनाव नहीं हो गए। अब उसे बिहार के चुनाव की चिंता है। इसके फलस्वरूप गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने जम्मू-कश्मीर सरकार को नोटिस भेजने की जरूरत महसूस की, तो प्रधानमंत्री ने भी आलम की रिहाई की निंदा की। सवाल है कि पीडीपी से गठजोड़ की बातचीत कई दौर में चली और हर नुक्ते पर तफसील से चर्चा हुई, फिर राजनीतिक बंदियों के मामले को अनिर्णीत क्यों छोड़ दिया गया। और भी ऐसे कई मुद््दे हैं जिन पर गठबंधन का घोषित एजेंडा खामोश या अस्पष्ट है। पीडीपी के किसी-किसी फैसले से दूरी दिखाना काफी नहीं है, भाजपा को चाहिए कि वह पीडीपी के साथ साझा सरकार के एजेंडे पर और स्पष्टता से बातचीत करे।

 

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