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जोड़ में दरार

बिहार में विधानसभा चुनाव की रणभेरी बज चुकी है। चुनाव को लगभग तीन महीने ही रह गए हैं। लेकिन बिहार को फतह करने का सपना देख रही भाजपा के माथे पर अब परेशानी की लकीरें दिखने लगी हैं। उसकी सबसे ज्यादा उम्मीद इस बात पर टिकी थी कि लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार एक […]

Author June 24, 2015 5:30 PM

बिहार में विधानसभा चुनाव की रणभेरी बज चुकी है। चुनाव को लगभग तीन महीने ही रह गए हैं। लेकिन बिहार को फतह करने का सपना देख रही भाजपा के माथे पर अब परेशानी की लकीरें दिखने लगी हैं। उसकी सबसे ज्यादा उम्मीद इस बात पर टिकी थी कि लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार एक नहीं हो पाएंगे, लिहाजा पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के वोट बंटेंगे और इसका जबर्दस्त फायदा उसे होगा। लेकिन जहां राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल (एकी) के गठबंधन के एलान ने भाजपा के सामने कड़ी चुनौती पेश कर दी, वहीं अब अपने सहयोगी दलों के रवैए से वह हलकान है। लोकसभा चुनाव में भाजपा से हाथ मिलाने के लिए जो पार्टियां बुरी तरह लालायित थीं, वे अब गठबंधन में बने रहने की कीमत मांगने लगी हैं। यों चुनाव से पहले गठबंधन में सीटों के बंटवारे को लेकर थोड़ी-बहुत तकरार आम बात है, पर जिस तरह राष्ट्रीय लोक समता पार्टी, लोक जनशक्ति पार्टी और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा ने सीटों की बढ़ी-चढ़ी मांगें पेश की हैं वह इस बात का भी संकेत है कि लोकसभा चुनाव की तरह अब मोदी लहर नहीं है।

भाजपा मानती है कि बिहार में उसके सहयोगी दलों की नैया मोदी लहर के सहारे ही पार लगी थी। पर अब इन दलों को लगता है कि विधानसभा चुनाव में उनसे तालमेल के बगैर भाजपा जीत का भरोसा नहीं पाल सकती। यही कारण है कि राजग में शामिल ये दल सीटों के बढ़-चढ़ कर दावे कर रहे हैं। बिहार में विधानसभा की कुल दो सौ तैंतालीस सीटें हैं। उपेंद्र कुशवाहा की अगुआई वाली राष्ट्रीय लोक समता पार्टी ने सड़सठ विधानसभा सीटों का दावा ठोंका है। जबकि लोकसभा में उसके केवल तीन सदस्य हैं। यही नहीं, पार्टी यह भी चाहती है कि कुशवाहा को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश किया जाए। भाजपा को यह कैसे मंजूर हो सकता है?

कुशवाहा को भी यह अहसास होगा कि भाजपा किसी भी सूरत में उन्हें मुख्यमंत्री पद का दावेदार नहीं मान सकती। इस तरह का प्रस्ताव उछालने का मकसद ज्यादा सीटों के लिए दबाव बनाना ही होगा। पर राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के प्रस्ताव ने मुख्यमंत्री पद को लेकर भाजपा के भीतर भी बेचैनी बढ़ा दी है। भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सीपी ठाकुर ने जिस तरह मुख्यमंत्री पद की दावेदारी के लिए अपना नाम आगे बढ़ाया है उसकी देखादेखी अन्य नाम भी उछाले जाएं तो हैरत की बात नहीं होगी। महादलित वोटों को रिझाने के लिए भाजपा ने जीतन राम मांझी की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया। पर मांझी चाहते हैं कि उन्हें करीब पचास सीटें दी जाएं। अलबत्ता भाजपा के लिए मुख्यमंत्री पद को लेकर न मांझी की तरफ से कोई अड़चन है न रामविलास पासवान की तरफ से। लेकिन इन सबके साथ सीटों के बंटवारे का मसला सुलझाना भाजपा के लिए आसान नहीं होगा।

लालू और नीतीश की जुगलबंदी के बाद वह अकेले चलने का भी जोखिम नहीं उठा सकती। लालू और नीतीश की सम्मिलित शक्ति का असर वह दस विधानसभा सीटों के उपचुनावों में देख चुकी है, जब उसे इनमें से केवल चार सीटें मिली थीं, जबकि ये उपचुनाव लोकसभा चुनाव के कुछ ही महीने बाद हुए थे। भाजपा भले यह कहती हो कि वह मोदी को आगे कर विधानसभा चुनाव लड़ेगी, पर वह जानती है कि उपेंद्र कुशवाहा, रामविलास पासवान और जीतन राम मांझी के साथ न रहने पर चुनाव का उसका सामाजिक समीकरण कमजोर हो जाएगा। दूसरी तरफ वह सहयोगी दलों को इतनी सीटें देने के लिए तैयार नहीं हो सकती कि उसके अपने ही बहुत-से लोग बागी हो जाएं। यह दिलचस्प है कि जो पार्टी वोट बैंक की राजनीति को हमेशा कोसती आई है वह भी वोट के जातिगत गणित को लेकर उधेड़बुन में है।

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