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बर्बरता का हथियार

लेखक और ब्लॉगर अविजीत रॉय की हत्या एक स्तब्ध कर देने वाली घटना है। बांग्लादेशी मूल के अमेरिकी नागरिक बयालीस वर्षीय अविजीत रॉय और उनकी पत्नी रफीदा अहमद बान्ना पर बीते हफ्ते ढाका में उस वक्त जानलेवा हमला हुआ, जब वे पुस्तक मेले से लौट रहे थे। रफीदा गंभीर रूप से जख्मी हैं। यह साफ […]

Author March 2, 2015 10:35 PM

लेखक और ब्लॉगर अविजीत रॉय की हत्या एक स्तब्ध कर देने वाली घटना है। बांग्लादेशी मूल के अमेरिकी नागरिक बयालीस वर्षीय अविजीत रॉय और उनकी पत्नी रफीदा अहमद बान्ना पर बीते हफ्ते ढाका में उस वक्त जानलेवा हमला हुआ, जब वे पुस्तक मेले से लौट रहे थे। रफीदा गंभीर रूप से जख्मी हैं। यह साफ है कि हमलावर एक कट््टरपंथी गुट से ताल्लुक रखते हैं। ट्विटर के जरिए इस हत्या की जिम्मेदारी लेते हुए हमलावरों ने कहा है कि अभिजीत को ‘इस्लाम विरोधी गुनाह’ के कारण मारा गया। इससे पता चलता है कि इक्कीसवीं सदी में भी हम कैसी दुनिया में जी रहे हैं, जहां अपने विचारों को व्यक्त करना कदम-कदम पर खतरों से भरा है। अभिजीत सेक्युलर थे, शायद नास्तिक भी, और वे अपने ब्लॉग पर बांग्लादेश के सेक्युलर स्वरूप और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में लिखते और मुहिम चलाते रहते थे। उनके ब्लॉग पर और बातों के अलावा इस्लाम के संबंध में कट्टरपंथी धारणाओं और व्याख्याओं की भी आलोचना होती थी, जो कुछ लोगों को रास नहीं आई। वे अविजीत रॉय को जान से मारने की धमकियां देते रहते थे। पर रॉय ने इसकी परवाह नहीं की और अपना लेखन और अभियान जारी रखा। उनकी मृत्यु एक शहादत है, वे निर्भीक अभिव्यक्ति और साहस की एक मिसाल बन चुके हैं। बांग्लादेश में इस तरह का यह पहला वाकया नहीं है। वर्ष 2004 में प्रोफेसर हुमायूं आजाद और 2013 में ब्लॉगर राजिद हैदर की भी इसी तरीके से हत्या हुई थी। पिछले दो साल में वहां और भी कई व्यक्तियों को वैचारिक स्वतंत्रता की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी है। अविजीत की शहादत के बाद हो रहे विरोध-प्रदर्शनों के पीछे आक्रोश के अलावा भविष्य की चिंता भी है, वह यह कि क्या बांग्लादेश मजहबी असहिष्णुता और तालिबान-मानसिकता की तरफ जाएगा, जो हैवानियत की शक्ल ले लेती है। या, सौहार्द और दिमागी खुलेपन को स्वीकार करने वाला सेक्युलर और प्रगतिशील राष्ट्र बनेगा?

भारत भी यही चाहेगा कि बांग्लादेश में कट्टररपंथ के खिलाफ जोर-शोर से आवाज उठे। पर यही हमें अपने देश में भी करना चाहिए। ऐसे लोगों की कमी नहीं, जो कट्टरपंथ को इस्लामी दुनिया तक सीमित मानते हैं और सोचते हैं कि अविजीत की हत्या जैसी घटना यहां नहीं हो सकती। पर याद करें, पिछले साल जून में मोहसिन सादिक शेख की पुणे में हिंदू राष्ट्र सेना नाम के संगठन से जुड़े कुछ लोगों ने दिनदहाड़े पीट-पीट कर हत्या कर दी थी। हमलावर फेसबुक पर शिवाजी और बाल ठाकरे के बारे में कथित ‘आपत्तिजनक’ पोस्ट डाले जाने से नाराज थे। यों मोहसिनका उस पोस्ट से कोई लेना-देना नहीं था; दरअसल हमलावरों ने उसे मुसलिम पहचान की वजह से मार डाला। पिछले कुछ महीनों में भारत में असहिष्णुता की और भी अनेक घटनाएं गिनाई जा सकती हैं। किसी भी व्यक्ति, समूह या संगठन को यह अधिकार नहीं है कि भावनाएं आहत होने का हवाला देकर किसी पर हमला बोल दे। यह किसी सभ्य समाज का लक्षण नहीं है। इस तरह की बर्बरता और तालिबान के सलूक में क्या फर्क है? हमें हर तरह की क्रूरता के खिलाफ होना चाहिए, चाहे वह बाहर हो या अपने देश और समाज के भीतर।

 

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