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अशोभन पर नकेल

अश्लील वेबसाइटों पर प्रतिबंध लगाने की मांग लंबे समय से उठती रही है। खासकर कम उम्र के बच्चों पर इनके नकारात्मक असर को लेकर चिंता जताई जाती रही है। यही वजह है कि कुछ समय पहले सर्वोच्च न्यायालय ने गृह मंत्रालय से अश्लील फिल्मों का कारोबार करने वाली ऐसी वेबसाइटों पर मौजूद सामग्री को लेकर […]

Author August 4, 2015 1:54 AM
पुलिस का कहना है कि उनके पास अभिभावको की शिकायत आई थी उनके किशोर बच्चे इंटरनेट कैफे पर जरूरत से ज्यादा समय बिताते हैं।

अश्लील वेबसाइटों पर प्रतिबंध लगाने की मांग लंबे समय से उठती रही है। खासकर कम उम्र के बच्चों पर इनके नकारात्मक असर को लेकर चिंता जताई जाती रही है। यही वजह है कि कुछ समय पहले सर्वोच्च न्यायालय ने गृह मंत्रालय से अश्लील फिल्मों का कारोबार करने वाली ऐसी वेबसाइटों पर मौजूद सामग्री को लेकर जवाब तलब किया था, जिनमें बच्चों का इस्तेमाल किया गया हो। इंटरनेट पर अभद्र यौन चित्रों और फिल्मों का दायरा इतना बड़ा और जटिल हो चुका है कि इनमें बच्चों के दुरुपयोग वाली सामग्री को छांट कर उन्हें प्रतिबंधित करना बड़ी चुनौती है। इसीलिए सरकार ने इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनियों से फिलहाल ऐसी आसान पहुंच वाली आठ सौ सत्तावन वेबसाइटों को पूरी तरह प्रतिबंधित करने को कहा है।

मगर समस्या यह है कि इस तरह उन वेबसाइटों को भी प्रतिबंधित करने नौबत आएगी, जिन्हें वयस्कों के लिए माना जाता है। इसलिए ऐसी आपत्तियां अभी से सामने आनी शुरू हो गई हैं कि बच्चों से संबंधित अश्लील सामग्री पर रोक लगाने के बहाने सरकार वयस्क नागरिकों के भी निजी क्षणों और जगहों को नियंत्रित करने और नैतिक पहरेदारी की कोशिश कर रही है। निजी तौर पर कोई वयस्क इंटरनेट पर किस तरह की सामग्री को देखता-पढ़ता है, इसमें सरकार को दखल नहीं देना चाहिए। पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा था कि कोई व्यक्ति अपने निजी क्षणों में क्या देखता है, यह तय नहीं किया जा सकता। मगर यह कैसे सुनिश्चित किया जा सकता है कि इंटरनेट पर मौजूद अश्लील सामग्री अगर वयस्कों के लिए आसानी से उपलब्ध है तो वह बच्चों की पहुंच से दूर हो!

दरअसल, यह जितना वयस्क नागरिकों की निजी जिंदगी के अधिकारों से जुड़ा मसला है, इससे संस्कृति के सवाल भी उतने ही गहरे जुड़े हुए हैं। अश्लील फिल्मों या वीडियो में प्रदर्शित सामग्री व्यक्ति की यौन इच्छाओं को भले तुष्ट करे, पर उचित यौन शिक्षा या इस विषय की सही जानकारी के अभाव में एक तरह की कुंठा भी पैदा करती है। कई बार ऐसे वीडियो में प्रयुक्त व्यवहारों को हिंसक यौन-ग्रंथियों की अभिव्यक्ति के रूप में भी देखा जाता है। जाहिर है, यह उचित सामाजिक प्रशिक्षण के अभाव में व्यक्ति के भीतर पहले से मौजूद तरह-तरह की कुंठाओं को और मजबूत करता है और कई बार स्त्रियों के प्रति प्रत्यक्ष यौन-हिंसा में भी सामने आता है।

परिपक्व यौन व्यवहार की जानकारी के उलट अश्लील सामग्री से निर्मित मानसिकता आमतौर पर व्यक्तित्व में नकारात्मक यौन ग्रंथियां ही विकसित करती है। मगर सच यह है कि इंटरनेट पर ऐसी सामग्री की आसान उपलब्धता के चलते बड़ी तादाद में लोग इसकी ओर आकर्षित होते हैं, जिनमें किशोरों से लेकर कम उम्र के बच्चे तक शामिल होते हैं। अंदाजा लगाया जा सकता है कि कोमल मन-मस्तिष्क वाले बच्चों पर इसका क्या असर पड़ता होगा। इसलिए ऐसी सामग्री तक पहुंच के मसले का नियमन जरूरी है, लेकिन ऐसी वेबसाइटों को प्रतिबंधित करने से अगर कोई शिक्षण सामग्री प्रभावित होती है, तो उसका हल भी निकालने की जरूरत है।

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