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संपादकीय: गठबंधन का गुब्बारा

सपा और बसपा ने इस गठबंधन के पीछे भाजपा को दूर रखने का ही मकसद जाहिर किया है। उन्होंने कांग्रेस से दूरी जरूर बनाए रखी है, पर अमेठी और रायबरेली की सीटें कांग्रेस के लिए छोड़ कर जाहिर कर दिया है कि वे सैद्धांतिक रूप से उससे दूर नहीं हैं।

Author January 14, 2019 1:42 AM
लखनऊ में साझा प्रेस कॉन्फ्रेन्स करती हुई बसपा सुप्रीमो मायावती और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव। (फोटो-PTI)

आम चुनाव के मद्देनजर महगठबंधन बनाने का प्रयास काफी दिनों से चल रहा है। विपक्षी दलों की कोशिश है कि किसी भी तरह भाजपा को सत्ता से बाहर रखा जाए। इसमें सबसे अधिक नजर उत्तर प्रदेश पर थी। माना जा रहा था कि अगर उत्तर प्रदेश में भाजपा का विजय रथ रोकने में कामयाबी मिल गई तो केंद्र में उसे सत्ता से दूर रखने में आसानी होगी। इसके लिए समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी को साथ लाने का प्रयास चल रहा था, क्योंकि इन दोनों दलों का जातीय आधार पर वोट अधिक है। मगर इन दोनों दलों ने किसी और को साथ लिए बिना गठबंधन कर लिया और सीटों की घोषणा भी कर दी। उसके बाद कांग्रेस ने भी घोषणा कर दी है कि वह अब अकेले उत्तर प्रदेश में सभी सीटों पर चुनाव लड़ेगी। इस तरह महागठबंधन की चुनावी कवायद को विराम लग गया है। हालांकि अब भी कुछ लोगों का मानना है कि इस गठबंधन से भाजपा को चुनौती मिलेगी, पर केवल उत्तर प्रदेश की यह चुनौती पूरी देश के स्तर पर कितना असर डाल पाएगी, देखने की बात है।

हालांकि सपा और बसपा ने इस गठबंधन के पीछे भाजपा को दूर रखने का ही मकसद जाहिर किया है। उन्होंने कांग्रेस से दूरी जरूर बनाए रखी है, पर अमेठी और रायबरेली की सीटें कांग्रेस के लिए छोड़ कर जाहिर कर दिया है कि वे सैद्धांतिक रूप से उससे दूर नहीं हैं। यानी सरकार बनाने का मौका आएगा, तो वे दोनों कांग्रेस का साथ देंगी। जाहिर है, सीटों के बंटवारे में दोनों पार्टियों ने अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं की भावनाओं का ध्यान रखा होगा, क्योंकि गठबंधन में जितने अधिक दल शामिल होते, उतनी ही उनकी सीटें कम होती जातीं। मगर इस गठबंधन का उन्हें कोई खास लाभ मिलेगा, कहना मुश्किल है। यह सही है कि दोनों दलों का उत्तर प्रदेश में जातीय आधार बहुत मजबूत है, पर सिर्फ इसी आधार पर उनका चुनाव जीतने का दावा बहुत दमदार नहीं माना जा सकता। दोनों दल उत्तर प्रदेश में सत्ता में रह चुके हैं और उनके कामकाज से वहां के लोग अच्छी तरह वाकिफ हैं। समाजवादी पार्टी के भीतर कुछ समय पहले ही टूट-फूट हो चुकी है और बसपा के जातीय समीकरण में नए कई छोटे दल सेंध लगा चुके हैं। फिर दोनों दलों पर अनियमितता, अपराधियों को संरक्षण देने और विकास कार्यों की अनदेखी जैसे आरोप हैं।

फिर यह भी देखना है कि सिर्फ उत्तर प्रदेश पर ध्यान केंद्रित करने से इन दोनों दलों का केंद्र में पहुंचने का सपना कितना पूरा हो पाएगा। सपा का उत्तर प्रदेश के बाहर कोई बड़ा जनाधार नहीं है। बसपा की उपस्थिति जरूर दूसरे कई प्रदेशों में अच्छी-खासी है, पर पिछले विधानसभा चुनावों में उसकी स्वीकार्यता पर प्रश्नचिह्न ही लगे हैं। पहले पंजाब में उसे निराशा हाथ लगी, जबकि वहां उसका जनाधार मजबूत है। फिर मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी वह अपनी ताकत नहीं दिखा पाई। आम चुनाव केवल किसी राज्य के स्तर पर समीकरण बना कर नहीं जीते जाते, इसके लिए पूरे देश में अपनी मजबूत पकड़ दिखानी होती है। मगर सपा और बसपा के गठबंधन से ऐसा लग रहा है जैसे वह लोकसभा के लिए नहीं, विधानसभा चुनाव के लिए बना हो। हकीकत यह भी है कि अब चुनाव का मुद्दा सिर्फ जातियों की रहनुमाई तक सीमित नहीं रह गया है, इसलिए इस गठबंधन का रास्ता बहुत आसान नहीं कहा जा सकता।

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