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सहिष्णुता के शत्रु

पश्चिम बंगाल के नदिया जिले में इकहत्तर साल की नन के साथ हुए सामूहिक बलात्कार के खिलाफ रोष-प्रदर्शन का सिलसिला चल ही रहा था कि ईसाई समुदाय को आहत करने वाली कुछ और खबरें आ गर्इं। नदिया के स्तब्ध कर देने वाले वाकये को भाजपा कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर तृणमूल सरकार की नाकामी साबित करना […]

Author March 24, 2015 9:05 AM

पश्चिम बंगाल के नदिया जिले में इकहत्तर साल की नन के साथ हुए सामूहिक बलात्कार के खिलाफ रोष-प्रदर्शन का सिलसिला चल ही रहा था कि ईसाई समुदाय को आहत करने वाली कुछ और खबरें आ गर्इं। नदिया के स्तब्ध कर देने वाले वाकये को भाजपा कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर तृणमूल सरकार की नाकामी साबित करना चाहती है। पर ताजा घटनाएं ऐसे राज्यों में हुई हैं जहां भाजपा सत्तासीन है। पिछले हफ्ते मध्यप्रदेश के जबलपुर में कुछ लोगों ने एक गिरजाघर में घुस कर तोड़-फोड़ की, वहां प्रार्थना के लिए मौजूद लोगों से बदसलूकी की, उन्हें धमकियां दीं और एक कैथोलिक स्कूल को भी निशाना बनाया। दूसरी घटना नवी मुंबई की है, जहां एक गिरजाघर के परिसर में पत्थर फेंके गए। इससे पहले हरियाणा के हिसार में एक निर्माणाधीन गिरजाघर को ध्वस्त करने की खबर आई थी। थोड़ा और पीछे जाएं, तो दिल्ली में एक के बाद एक कई गिरजाघरों पर हमले हुए थे। ऐसी घटनाओं को कानून-व्यवस्था की सामान्य विफलता के रूप में देखना सही नहीं होगा।

दरअसल, अल्पसंख्यकों को आतंकित करने की सुनियोजित कोशिशें हो रही हैं। यह भी सच है कि मोदी सरकार आने के बाद धार्मिक असहिष्णुता की प्रवृत्ति बढ़ी है, ऐसे तत्त्वों का हौसला बढ़ा है। वे सोचते हैं कि कुछ भी करें, उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा। हिसार में निर्माणाधीन गिरजाघर को ध्वस्त करने की घटना पर केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने भले चिंता जताई हो, पर विश्व हिंदू परिषद के एक पदाधिकारी ने उसके बचाव में बयान दिया। नवी मुंबई के मामले में पत्थर फेंकने वालों की शिनाख्त होना अभी बाकी है। मगर खबर है कि जबलपुर में गिरजाघर में घुस कर तोड़-फोड़ और दुर्व्यवहार करने वाले बजरंग दल और हिंदू धर्म सेना के थे। उन्होंने एक पादरी पर जबरन धर्म परिवर्तन करने का आरोप लगाया। अगर यही बात थी तो पुलिस में इसकी शिकायत दर्ज कराई जा सकती थी। इसके बजाय हिंदू धर्म सेना और बजरंग दल ने गिरजाघर पर धावा क्यों बोल दिया?

जहां भाजपा की सरकार है, क्या वहां भी उन्हें कानून के ठीक ढंग से काम करने का भरोसा नहीं है! ऐसा लगता है कि कुछ संगठन अल्पसंख्यकों को खौफजदा करने के लिए कोई न कोई बहाना गढ़ते रहते हैं। मध्यप्रदेश में ईसाइयों को निशाना बनाने का सिलसिला नब्बे के दशक में ही शुरू हो गया था, इसमें ननों के साथ बलात्कार भी शामिल था, अविभाजित मध्यप्रदेश का झाबुआ कांड इसी तरह का था। गुजरात के डांग जिले में ईसाई समुदाय पर हमले और भी सुनियोजित तरीके से हुए।

हाल की ऐसी घटनाओं के चलते जब अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी चिंता जताई, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश की अंतरराष्ट्रीय छवि को लेकर फिक्रमंद हुए और फिर उन्होंने धार्मिक असहिष्णुता की कड़ी निंदा करते हुए सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी। मजे की बात है कि ईसाई समुदाय के एक समारोह को संबोधित करते हुए ही उन्होंने यह संदेश दिया था। लेकिन क्या कारण है कि एक तरफ प्रधानमंत्री और गृहमंत्री ऐसी चेतावनियां देते रहते हैं और दूसरी तरफ बजरंग दल और हिंदू धर्म सेना जैसे संगठन अपनी करतूतों से बाज नहीं आते? अपने सेवा-काल में आतंकवाद-विरोधी कार्रवाई के लिए मशहूर हुए पूर्व आइपीएस अधिकारी जूलियो रिबेरो ने ठीक ही कहा है कि मोदी को जनता ने इतनी ताकत दी है कि वे चाहें तो ऐसी घटनाएं एक दिन में थम जाएं। ऐसा क्यों नहीं हो पा रहा है?

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