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यातना के विरुद्ध

हिरासत में लिए गए लोगों का उत्पीड़न आम बात है। उनमें से कइयों की यातना की वजह से मौत भी हो जाती है। इसके मद््देनजर मानवाधिकारों के लिए काम करने वाले समूह लंबे समय से पुलिस सुधारों की मांग करते रहे हैं। लेकिन इस दिशा में अब तक कोई ठोस पहल नहीं हो पाई है। […]

Author July 27, 2015 2:39 PM

हिरासत में लिए गए लोगों का उत्पीड़न आम बात है। उनमें से कइयों की यातना की वजह से मौत भी हो जाती है। इसके मद््देनजर मानवाधिकारों के लिए काम करने वाले समूह लंबे समय से पुलिस सुधारों की मांग करते रहे हैं। लेकिन इस दिशा में अब तक कोई ठोस पहल नहीं हो पाई है। थानों में महिला पुलिसकर्मियों की नियुक्ति की घोषणा जैसी इक्का-दुक्का सुगबुगाहट सामने आती भी है तो उस पर अमल को लेकर गंभीरता नहीं दिखती। लेकिन अब पुलिस हिरासत में अत्याचार की प्रवृत्ति पर रोक लगाने के मकसद से सर्वोच्च अदालत ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों से कहा है कि सभी पुलिस थानों और पूछताछ के कमरों को सीसीटीवी कैमरों की निगरानी की जद में लाया जाए।

इसके अलावा, हरेक थाने में कम से कम दो महिला पुलिसकर्मियों की तैनाती करनी होगी। गौरतलब है कि हिरासत में कैदियों को यातना दिए जाने और उनकी मौत की घटनाओं की रोकथाम के लिए 1986 में एक जनहित याचिका दायर की गई थी। अदालत ने यह आदेश इसी मसले पर सहयोग कर रहे वकीलों की सिफारिशों के आधार पर दिया। सुझावों में यह भी शामिल है कि पुलिस थानों का नियमित और औचक निरीक्षण किया जाए और सीसीटीवी कैमरों के फुटेज देख कर और कैदियों से बात कर यह पता लगाया जाए कि क्या वहां हिरासत में कोई हिंसा हुई है! जाहिर है, अब तक थानों में या हिरासत में लिए गए गए लोगों के साथ जिस तरह अक्सर बर्बरता का सलूक और कई बार उसका परिणाम अपंगता या मौत में होता रहा है, उसमें अदालत यह आदेश काफी अहम है। थानों को सीसीटीवी कैमरे जैसी तकनीक के जरिए निगरानी के दायरे में लाने से हिरासत में यातना देने की प्रवृत्ति पर काफी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है।

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इस मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने उचित ही इस ओर भी ध्यान दिया कि कई राज्यों में मानवाधिकार आयोग का वजूद ही नहीं है। पुलिस थानों में यातना के मामले में इंसाफ की उम्मीद लिये लोग मानवाधिकार आयोग का ही रुख करते हैं। लेकिन अगर देश की राजधानी दिल्ली सहित कई राज्यों में इस आयोग का अस्तित्व ही नहीं है तो ऐसे में पीड़ित कहां गुहार लगाएं? अदालत ने दिल्ली, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, मेघालय, त्रिपुरा और नगालैंड में मानवाधिकार आयोग नहीं होने पर भी चिंता जताई और इसके गठन का निर्देश दिया। यह छिपा नहीं है कि किसी आरोप में पकड़े गए जिन लोगों को यातना दी जाती है, उनमें से ज्यादातर कमजोर तबके के होते हैं। ऐसे लोगों के लिए सामाजिक-आर्थिक वजहों से अपने उत्पीड़न के खिलाफ शिकायत करना और उसे तार्किक परिणति तक ले जाना बहुत मुश्किल होता है।

सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं को भी कानून को ताक पर रख कर प्रताड़ित करने के मामले सामने आते रहते हैं। ऐसी घटनाएं मानवाधिकार आयोग के संज्ञान में आने पर भी ज्यादातर मामलों में दोषी अधिकारियों का कुछ नहीं बिगड़ता। दरअसल, चाहे राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग हो या राज्य-स्तरीय, उन्हें पर्याप्त अधिकार और संसाधन हासिल नहीं हैं। इसलिए उनकी भूमिका नोटिस देने और कार्रवाई की सिफारिश करने तक सीमित होकर रह गई है। मानवाधिकार आयोगों को और सक्षम बनाने की जरूरत है। यह तकाजा कब पूरा होगा!

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