ताज़ा खबर
 

दिल्ली की जंग

आम आदमी पार्टी की सरकार और दिल्ली के उपराज्यपाल के बीच अधिकारों को लेकर विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा। हालांकि करीब तीन महीने पहले दिल्ली उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया था कि अधिकारियों की नियुक्ति आदि के मामले में मुख्यमंत्री को पूरे अधिकार प्राप्त हैं; राज्यपाल उसमें नाहक दखल दे रहे हैं। […]

आम आदमी पार्टी की सरकार और दिल्ली के उपराज्यपाल के बीच अधिकारों को लेकर विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा। हालांकि करीब तीन महीने पहले दिल्ली उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया था कि अधिकारियों की नियुक्ति आदि के मामले में मुख्यमंत्री को पूरे अधिकार प्राप्त हैं; राज्यपाल उसमें नाहक दखल दे रहे हैं। इसके बाद भी उपराज्यपाल नजीब जंग ने एसीबी यानी भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो के मुखिया के तौर पर मुकेश कुमार मीणा की नियुक्त कर दी। इसे लेकर मुख्यमंत्री और उपराज्यपाल के बीच चलती आ रही तकरार तीखी हो गई। अब दिल्ली सरकार की तरफ से महिला आयोग की अध्यक्ष के रूप में स्वाति मालीवाल की नियुक्ति को उपराज्यपाल ने असंवैधानिक करार दे दिया है।

एक बार फिर जंग ने इस बात को रेखांकित किया है कि दिल्ली में सरकार का मतलब उपराज्यपाल का शासन है। उन्होंने सरकार को चिट्ठी लिख कर महिला आयोग को पुनर्गठित करने और नवनियुक्त स्वाति मालीवाल को दफ्तर न आने को कहा है। उपराज्यपाल की दिल्ली सरकार से तकरार की वजह छिपी नहीं है। शुरू में जब अधिकारियों की नियुक्ति को लेकर सरकार और उपराज्यपाल के बीच विवाद शुरू हुआ और इसमें केंद्र सरकार से मध्यस्थता की गुहार लगाई गई, तो गृह मंत्रालय ने अधिसूचना जारी कर कहा था कि उपराज्यपाल जो कर रहे हैं, वह उचित है; दिल्ली सरकार को उनके निर्देशों का पालन करना चाहिए। तभी यह भी स्पष्ट हो गया था कि उपराज्यपाल को ऐसा करने की ताकत कहां से मिल रही है। पर सवाल यह है कि अगर सारे अधिकार उपराज्यपाल में निहित हैं, तो निर्वाचित सरकार का क्या मतलब है? एक चुनी हुई सरकार को इस तरह पंगु बनाना जनादेश की अवमानना भी है और जवाबदेही के तकाजे को अंगूठा दिखाना भी।

दिल्ली की संवैधानिक स्थिति जरूर बाकी राज्यों से भिन्न है, पर इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए कि वह बाकी केंद्रशासित प्रदेशों की तरह भी नहीं है। यहां निर्वाचित सरकार है, उसकी मंत्रिपरिषद है। संविधान में स्पष्ट प्रावधान है कि जहां भी निर्वाचित राज्य सरकारें हैं वहां राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सलाह पर काम करेंगे। जहां भी राज्य सरकार और राज्यपाल के अधिकारों के बीच टकराव को लेकर मामला अदालत में पहुंचा है, वहां फैसला सरकार के पक्ष में आया है। दिल्ली उच्च न्यायालय भी तीन महीने पहले उपराज्यपाल के अधिकार क्षेत्र को स्पष्ट कर चुका है।

फिर भी अगर उपराज्यपाल निर्वाचित सरकार के संवैधानिक अधिकारों को ध्वस्त करने पर तुले हैं तो इसके पीछे केवल उनकी जिद नहीं होगी। केंद्र सरकार की मंशा के बगैर उपराज्यपाल इस हद तक नहीं जा सकते। दिल्ली में इसके पहले जो मुख्यमंत्री हुए, किसी को अपने अधिकारियों की नियुक्ति, पदोन्नति और तैनाती के लिए इस तरह केंद्र का मोहताज नहीं होना पड़ा। दिल्ली महिला आयोग के अध्यक्ष पद पर नियुक्ति के बाद महिलाओं के खिलाफ हुए आपराधिक मामलों को लेकर बैठक होनी थी। जाहिर है, इसमें दिल्ली पुलिस से जवाब तलब किया जाता। इससे केंद्र सरकार की संजीदगी पर भी अंगुली उठती। लेकिन एक सवाल आप सरकार के रवैए पर भी उठता है। उसे दिल्ली महिला आयोग के अध्यक्ष पद के लिए कोई ऐसा नाम चुनना चाहिए था, जिस पर पार्टी से जुड़े होने की बात नहीं कही जाती।

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App। जनसत्‍ता टेलीग्राम पर भी है, जुड़ने के ल‍िए क्‍ल‍िक करें।

Next Stories