ताज़ा खबर
 

जनसत्ता संपादकीय : पद कुपद

सवाल यह भी है कि दिल्ली जैसे छोटे राज्य में इक्कीस संसदीय सचिवों की जरूरत ही क्या थी? राष्ट्रपति के द्वारा विधेयक लौटा दिए जाने के बाद गेंद निर्वाचन आयोग के पाले में है।

नई दिल्ली | June 15, 2016 4:15 AM
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल। (पीटीआई फाइल फोटो)

आम आदमी पार्टी की सरकार ने जब अपने इक्कीस विधायकों को संसदीय सचिव बनाने का फैसला किया था, तभी से उसके औचित्य पर सवाल उठ रहे थे। पर उसने उन सवालों की लगातार अनदेखी की। इसका खमियाजा उसे भुगतना पड़ सकता है। गौरतलब है कि आप सरकार का संसदीय सचिव विधेयक राष्ट्रपति ने वापस कर दिया है। इसके फलस्वरूप, विभिन्न मंत्रालयों और महकमों के संसदीय सचिव बनाए गए आप के विधायकों की सदस्यता पर तलवार लटकने लगी है। दिल्ली सरकार अपने अनेक विधायकों के खिलाफ शिकायतों को लेकर कई और विवादों में पड़ चुकी है। उपराज्यपाल से तो हमेशा ठनी ही रही है।

उपराज्यपाल से तकरार को मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल बराबर इसी रूप में पेश करते रहे हैं कि उनकी सरकार को काम करने नहीं दिया जा रहा, उसके पर कतरे जा रहे हैं। क्या पता, संसदीय सचिव विधेयक खारिज होने को भी वे यही रंग देने की कोशिश करें। बल्कि राष्ट्रपति के निर्णय को केंद्र सरकार की सिफारिश का नतीजा कह कर और एक बार फिर प्रधानमंत्री पर निशाना साध कर उन्होंने इसकी शुरुआत कर दी है। लेकिन संसदीय सचिव विधेयक खुद केजरीवाल की निरंकुशता का उदाहरण है। सत्ता में आने के कोई महीने भर बाद अपने इक्कीस विधायकों को उन्होंने विभिन्न मंत्रालयों और विभागों से संबद्ध कर संसदीय सचिव का ओहदा दे दिया।

जब आरोप लगने लगने लगे कि ये लाभ के पद हैं, और इसलिए ये नियुक्तियां अवैध हैं, तो केजरीवाल ने कहना शुरू किया कि इन विधायकों को कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं दी गई है, इन्हें बस संबंधित मंत्रियों के कामकाज में सहायता के लिए नियुक्त किया गया है। यही तर्क उन्होंने एक बार फिर दोहराया है। लेकिन इन नियुक्तियों को वैधानिक जामा पहनाने के लिए जो विधेयक पिछले साल उन्होंने विधानसभा से पारित कराया था उसके पीछे छिपे इरादे का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि विधेयक में उसके छह महीने पहले से लागू होने का प्रावधान भी शामिल था। लेकिन यह चतुराई आप सरकार को महंगी पड़ी है।

सवाल यह भी है कि दिल्ली जैसे छोटे राज्य में इक्कीस संसदीय सचिवों की जरूरत ही क्या थी? राष्ट्रपति के द्वारा विधेयक लौटा दिए जाने के बाद गेंद निर्वाचन आयोग के पाले में है। आयोग की सिफारिश पर ही राष्ट्रपति सदस्यता संबंधी निर्णय लेंगे। फिर, मामला शायद हाइकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में भी जा सकता है। जनप्रतिनिधि की सदस्यता किन-किन स्थितियों में रद््द की जा सकती है और इसका अधिकार किसे है, इन सब बातों पर, और लाभ के पद की परिभाषा आदि को लेकर इस बीच देश में बहस भी चलती रहेगी। पर यह साफ है कि आप सरकार ने जैसा विधेयक पारित कराया वह विधानसभा में उसके प्रचंड बहुमत का दुरुपयोग था।

दिल्ली की सत्तर सदस्यीय विधानसभा में आप के सड़सठ विधायक हैं। अगर इक्कीस विधायकों की सदस्यता रद््द हो जाती है तब भी आप सरकार के वजूद को कोई खतरा नहीं होगा; वैसी सूरत में भी छियालीस विधायकों के साथ उसके पास पर्याप्त बहुमत होगा। पर तब खाली होने वाली सीटों पर छह महीने में फिर से चुनाव कराने होंगे। अगर उनमें से कुछ सीटों पर भी आम आदमी पार्टी वापसी नहीं कर पाई तो उसे केजरीवाल की अपरिपक्वता के चलते पार्टी को हुए नुकसान के तौर पर देखा जाएगा। नैतिक रूप से नुकसान तो हो चुका है।

Next Stories
1 जनसत्ता संपादकीय : दुरुस्त आयद
2 जनसत्ता संपादकीय : जनसंहार के तार
3 जनसत्ता संपादकीय : जांच की आंच
यह पढ़ा क्या?
X