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जनसत्ता संपादकीय : अरुणाचल की गद्दी

अरुणाचल में कांग्रेस की एकजुटता से भाजपा को भारी झटका लगा है। भाजपा को लग रहा था कि शक्ति परीक्षण के वक्त कांग्रेस को एक बार फिर मुंह की खानी पड़ सकती है।

नई दिल्ली | Updated: July 18, 2016 12:10 AM
अरुणाचल प्रदेश में नबाम तुकी (फोटो में) की जगह पेमा खांडु को कांग्रेस विधायक दल का नेता बनाया गया है।

अरुणाचल में कांग्रेस की एकजुटता से भाजपा को भारी झटका लगा है। भाजपा को लग रहा था कि शक्ति परीक्षण के वक्त कांग्रेस को एक बार फिर मुंह की खानी पड़ सकती है। मगर कांग्रेस के तीस बागी विधायकों के वापस पार्टी में आ जाने और नए मुख्यमंत्री के समर्थन में खड़े हो जाने से उसके सारे कयास धरे के धरे रह गए। यह ऐसे समय हुआ है जब भाजपा पूर्वोत्तर में अपना जनाधार बढ़ाने के प्रयास में जोर-शोर से जुटी हुई है। असम में सरकार बनने के बाद उसके हौसले बुलंद हैं और वह पूरे पूर्वोत्तर में पैर पसारने का प्रयास कर रही है। इसी मकसद से पिछले हफ्ते भाजपा ने पूर्वोत्तर के गैर-कांग्रेसी दलों के साथ मिलकर नार्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस बनाया। उसने पूर्वोत्तर को कांग्रेस मुक्त बनाने का नारा भी दे दिया। मगर अरुणाचल में कांग्रेस की वैधानिक वापसी से निश्चित रूप से उसे काफी धक्का पहुंचा है। पिछले हफ्ते सर्वोच्च न्यायालय ने अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल के फैसले को अनुचित ठहराते हुए कांग्रेस को वहां बहुमत साबित करने का आदेश दिया था।

दरअसल, पिछले साल नवंबर में जब अरुणाचल कांग्रेस के कुछ विधायकों ने तत्कालीन नबाम तुकी सरकार के खिलाफ विद्रोह का झंडा बुलंद किया था तब भाजपा को लगा था कि वह वहां सत्ता पर काबिज हो सकती है। इसी मकसद से वह बागी विधायकों के साथ खड़ी हो गई थी। कांग्रेस के बागी विधायकों ने विधानसभा से बाहर अलग से विशेष सत्र बुलाया और नबाम तुकी सरकार को बर्खास्त कर दिया। इस पर राज्यपाल का भी उन्हें समर्थन मिला और उन्होंने कलिको पुल के नेतृत्व में भाजपा और कांग्रेस के बागी विधायकों की सरकार बनवा दी। केंद्र ने भी आनन-फानन में पहले राष्ट्रपति शासन लगाया, फिर राज्यपाल के मन मुताबिक फैसला किया। इस पर भाजपा को खासी किरकिरी झेलनी पड़ी। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद अब उसके पास कोई जवाब नहीं बचा है। अरुणाचल के बाद उत्तराखंड में भी उसने कांग्रेसी विधायकों को बगावत के लिए उकसाने और फिर तख्ता पलट कर अपने समर्थन से सरकार बनवाने का प्रयास किया। उसमें भी उसे अदालत में मुंह की खानी पड़ी। दोनों घटनाओं से भाजपा की साख को काफी धक्का पहुंचा है। इतना ही नहीं कांग्रेस मुक्त भारत के उसके नारे का निहितार्थ भी लोगों की समझ में आने लगा है कि विकास या बेहतरी के बजाए उसकी नजर येन केन प्रकारेण सत्ता हथियाने पर है।

अरुणाचल की सत्ता वापस मिलने से निस्संदेह कांग्रेस का मनोबल ऊंचा हुआ है। बागी विधायकों ने पार्टी में फिर से शामिल होकर एक बार फिर अपनी निष्ठा जाहिर की है। दरअसल वहां के बहुत सारे विधायकों और कार्यकर्ताओं को शिकायत रहती है कि केंद्रीय नेतृत्व उनकी बातों को कोई तवज्जो नहीं देता। वहां के बागी विधायकों ने अब अगर सोनिया गांधी और राहुल गांधी के फैसले को उचित माना है तो जाहिर है कि केंद्रीय नेतृत्व ने उनके साथ मिल बैठ कर बात की, उनकी बातों पर गौर किया और उन्हें भरोसे में लिया। पहले लोकसभा और फिर कई विधानसभाओं में लगातार हार का मुंह देखने के बाद कांग्रेस का विश्वास डिगने लगा था। अब संसद के मानसून सत्र में पार्टी कुछ आत्मविश्वास के साथ विपक्ष की भूमिका में खड़ी हो सकेगी। हां, अरुणाचल और उत्तराखंड के घटनाक्रम से भाजपा को जरूर सबक लेने की जरूरत है। कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने का रास्ता वह कतई नहीं हो सकता, जो उसने इन दो राज्यों में अख्तियार किया।

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