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संपादकीय: पाक का पैंतरा

पाकिस्तान से वार्ता को लेकर भारत का हमेशा से स्पष्ट रुख रहा है। भारत एक नहीं, कई बार आधिकारिक रूप से कह चुका है कि पाकिस्तान के साथ वार्ता की पहली शर्त है कि वह सीमापार आतंकवाद बंद करे।

Author January 14, 2019 1:47 AM
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान और पीएम नरेंद्र मोदी (फोटो सोर्स : Express Group Photo)

पाकिस्तान ने भारत के साथ वार्ता को लेकर फिर से जो हथकंडा अपनाया है, वह कोई नया नहीं है। इसीलिए भारत ने दो-टूक कह दिया है कि पाकिस्तान वार्ता को लेकर न तो अभी गंभीर है, न ही पहले कभी गंभीर रहा है, बल्कि उसका एकमात्र मकसद भारत में आतंक फैला कर अस्थिरता पैदा करना रहा है, ऐसे में पाकिस्तान के साथ क्या बात की जाए! वार्ता को लेकर भारत को अपना यह कड़ा रुख पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के उस बयान के बाद दिखाना पड़ा जिसमें उन्होंने भारत के साथ बातचीत की पेशकश की थी। हालांकि सब जानते हैं कि यह कोई नई बात नहीं है। जब भी मौका आता है तब पाकिस्तान अपने बचाव में यह कहता नजर आता है कि वह तो भारत से बात करना चाहता है, लेकिन भारत की ओर से उसे कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिलता। लेकिन इस बार भारत ने वार्ता की पेशकश को लेकर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री से जो सवाल पूछे हैं, वे उनकी कलई खोलने के लिए काफी हैं।

पाकिस्तान से वार्ता को लेकर भारत का हमेशा से स्पष्ट रुख रहा है। भारत एक नहीं, कई बार आधिकारिक रूप से कह चुका है कि पाकिस्तान के साथ वार्ता की पहली शर्त है कि वह सीमापार आतंकवाद बंद करे। जब तक पाकिस्तान अपनी जमीन से संचालित होने वाली आतंकी गतिविधियों को नहीं रोकता तब तक बातचीत का कोई सवाल ही नहीं उठता। यही रुख भारत ने इस बार भी दोहराया और पूछा है कि अगर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री बातचीत के लिए गंभीर हैं तो फिर वे आतंकी संगठनों पर लगाम क्यों नहीं लगा रहे हैं। जबकि इमरान इस तथ्य और हकीकत से अच्छी तरह वाकिफ हैं कि उनके देश में सेना और आइएसआइ की छत्रछाया में पल रहे आतंकी संगठन किस तरह से भारत के खिलाफ छद्म युद्ध छेड़े हुए हैं। इतना ही नहीं, पिछले साल सितंबर में इमरान खान सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री आतंकी सरगना हाफिज सईद के साथ मंच साझा करते नजर आए थे और दोनों ने भारत के खिलाफ आग उगली थी। फिर भी सरकार ने मंत्री पर कोई कार्रवाई नहीं की। इससे पता चलता है कि भारत को लेकर पाकिस्तान सरकार का रुख कैसा है।

हकीकत यह है कि जब-जब भारत ने शांति की पहल की है, तब-तब पाकिस्तान ने असली चेहरा दिखाया है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी तो दोस्ती और अमन का पैगाम लेकर लाहौर गए थे, लेकिन उसके बाद भारत को करगिल का युद्ध देखना पड़ा। उसके बाद मुंबई और पठानकोट जैसे हमलों की साजिश भी पाकिस्तान की जमीन पर ही रची गई और दोषियों के खिलाफ आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई, बल्कि इन हमलों के साजिशकर्ता खुलेआम राजनीति में शिरकत कर रहे हैं। अमेरिका भी पाकिस्तान से आतंकी संगठनों पर लगाम कसने को कह चुका है। लेकिन पाकिस्तान पर इसका कोई असर नहीं है। कुछ समय पहले चीन में हुए ब्रिक्स सम्मेलन में लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मुहम्मद जैसे आतंकी संगठनों को शरण देने के लिए पाकिस्तान पर सवाल उठे थे। इसके बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने स्वीकारा था कि कुछ आतंकी संगठन पाक के ठिकानों से गतिविधियां चलाते हैं। सच्चाई तो यह है कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था जर्जर हो चुकी है, जन कल्याण के लिए उसके पास कोई योजनाएं नहीं हैं, ऐसे में अवाम का ध्यान भटकाने के लिए ही उसने भारत से वार्ता का पैंतरा चला, जिसका भारत ने करारा जवाब दे दिया है।

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