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संपादकीय: चुनौतियां और उम्मीदें

शिखर सम्मेलन में चीन और अमेरिका सबसे ज्यादा छाए रहे। चीन दुनिया की ऐसी महाशक्ति बन गया है जो अमेरिका को खुल कर चुनौती दे रहा है। दोनों देशों के बीच व्यापार युद्ध ने सबकी नींद उड़ा दी है।

Author December 3, 2018 1:35 AM
भारत-चीन-रूस के बीच कोई बारह साल बाद त्रिपक्षीय संवाद हुआ।(पीटीआई फोटो)

अर्जेंटीना की राजधानी ब्यूनस आयर्स में जी-20 देशों का सम्मेलन उन्हीं चिंताओं के साथ खत्म हुआ है जो दुनिया के सारे अमीर-गरीब देशों के सामने हैं और जिन संकटों से वे जूझ रहे हैं। हालांकि यह कोई पहला मौका नहीं है जब समूह देशों के सम्मेलनों में इस तरह की चिंताएं जताई गई हों। चाहे विकसित देशों के समूहों का सालाना मजमा हो या फिर विकासशील देशों का जमावड़ा, घूम फिर कर सबकी चिंताएं और संकट वहीं आ जाते हैं। संकटों का हल निकले या न निकले, यह अलग बात है, लेकिन सम्मेलन की समाप्ति पर होने वाली घोषणाओं से कुछ उम्मीदें तो बंधती ही हैं। दुनिया के ज्यादातर देश इस वक्त आतंकवाद, आतंरिक सुरक्षा, वैश्विक व्यापार, मंदी की आशंका और जलवायु संकट जैसे समान संकटों से जूझ रहे हैं। इसलिए इनका हल भी सामूहिक रूप से ही निकाला जा सकता है। जी-20 शिखर बैठक से इतर भी कई देशों ने अपनी-अपनी बैठकें कीं। मसलन, भारत-चीन-रूस के बीच कोई बारह साल बाद त्रिपक्षीय संवाद हुआ। इस लिहाज से अर्जेंटीना की राजधानी में हुई यह शिखर बैठक काफी महत्त्वपूर्ण रही है।

भारत ने इस वैश्विक मंच से एक बार फिर सुरक्षा और आतंकवाद का जो मुद्दा उठाया है, वह भारत की चिंताओं को रेखांकित करता है। भारत के लिए आतंकवाद का मुद्दा गंभीर इसलिए है क्योंकि लंबे समय से भारत पड़ोसी देश पाकिस्तान की ओर से सीमापार आतंकवाद की मार झेल रहा है। पाकिस्तान भारत के कश्मीर और पंजाब में किस तरह आतंक फैला रहा है और कश्मीर को लेकर भारत के खिलाफ दुनिया में दुष्प्रचार करता रहा है, यह किसी से छिपा नहीं है। ऐसे में वैश्विक मंच से आतंकवाद के खिलाफ भारत की चिंता जायज है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र के आतंकवाद रोधी ढांचे को मजबूत बनाने की वकालत की है, ताकि आतंकियों को हथियार खरीद के लिए पहुंचाए जाने वाले पैसे पर रोक लगाई जा सके।

एक बड़ी उपलब्धि यह भी रही कि शिखर सम्मेलन से अलग भारत, रूस के चीन के नेताओं की एक साथ वार्ता हुई, जिसमें बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली और मुक्त अर्थव्यवस्था पर चर्चा हुई। जलवायु संकट के मुद्दे पर भारत ने पुरजोर तरीके से अपना पक्ष रखा, जो बड़े देशों के नेताओं के लिए यह स्पष्ट संदेश है कि अगर जलवायु संकट के लिए वे दुनिया के छोटे और गरीब मुल्कों को दोषी ठहराते रहेंगे तो यह संकट हल होने के बजाय और बढ़ेगा।

शिखर सम्मेलन में चीन और अमेरिका सबसे ज्यादा छाए रहे। चीन दुनिया की ऐसी महाशक्ति बन गया है जो अमेरिका को खुल कर चुनौती दे रहा है। दोनों देशों के बीच व्यापार युद्ध ने सबकी नींद उड़ा दी है। रूस के साथ चीन के रिश्ते अमेरिका की परेशानियों को और बढ़ा रहे हैं। पाकिस्तान और चीन के रिश्ते आपसी हितों पर टिके हैं और इसमें चीन-पाक आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) में दोनों देशों की जान अटकी है। इस गलियारे के जरिए चीन अरब सागर तक पहुंचेगा और इसके एवज में पाकिस्तान को आर्थिक मदद देता रहा। लेकिन भारत के साथ चीन का पुराना सीमा विवाद है और भारत चीन के लिए बड़ा बाजार भी है। ऐसे में चीन भारत का भी हाथ थामे रखने की रणनीति पर चल रहा है। चीन की यह सारी रणनीति दक्षिण चीन सागर में दबदबा कायम करने पर केंद्रित है, जबकि अमेरिका किसी भी सूरत में दक्षिण चीन सागर में चीन की बढ़ती ताकत को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है। शिखर बैठक के नतीजों, रजामंदी और नेताओं के परस्पर विमर्श से बनी सहमति को तार्किक अंजाम तक पहुंचाने के लिए जरूरी होगा कि शांति और सदभाव को केंद्र में रखते आगे बढ़ा जाए।

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