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संपादकीय: मनमानी का खनन

सीबीआई के ताजा छापों को कुछ लोग राजनीतिक नजरिए से देख सकते हैं, पर हकीकत यह है कि अवैध रेत खनन के मामले पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सीबीआई जांच का आदेश दिया था। उसी तहत चली जांचों में मंत्रियों-अधिकारियों की संलिप्तता उजागर हुई है।

Author January 7, 2019 2:54 AM
अखिलेश यादव, फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस

नदियों से अतार्किक ढंग से रेत निकालने की वजह से अनेक जगहों पर पर्यावरण को गंभीर खतरा पहुंचा है। इसलिए राष्ट्रीय हरित अधिकरण यानी एनजीटी ने मनमनाने तरीके से रेत खनन पर प्रतिबंध लगा दिया था। मगर रेत के धंधे में बेपनाह कमाई होने की वजह से रसूखदार ठेकेदार मंत्रियों-अधिकारियों से साठगांठ कर अवैध खनन का कोई न कोई रास्ता निकालते रहे हैं। इस मामले में उत्तर प्रदेश कुछ अधिक बदनाम रहा है। वहां के कुछ पूर्व अधिकारियों और मंत्रियों के घरों-दफ्तरों आदि पर पड़े सीबीआई के छापों से एक बार फिर इस बात की पुष्टि हुई है। यहां तक कि पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पर भी सीबीआई की नजर है। सीबीआई ने माना है कि इस मामले में अखिलेश यादव की संलिप्तता हो सकती है, क्योंकि खनन विभाग की जिम्मेदारी उन्होंने खुद संभाल रखी थी। खनन विभाग के तत्कालीन आला अधिकारी के घरों और दूसरे ठिकानों से प्राप्त दस्तावेजों से ऐसे संकेत मिले हैं। इसके अलावा अखिलेश सरकार में रहे तीन मंत्रियों और उनके निजी सचिवों के खिलाफ भी पुख्ता सबूत मिले हैं। तीन मंत्रियों के निजी सचिवों को गिरफ्तार कर लिया गया है।

चूंकि भवन निर्माण में बड़े पैमाने पर रेत की जरूरत पड़ती है, इसका कारोबार करने वाले भारी मुनाफा कमाते हैं। इसलिए नदियों से रेत निकालने का पट्टा हासिल करने के लिए ठेकेदारों में होड़ लगी रहती है। उत्तर प्रदेश और बिहार में चूंकि रेत वाली नदियों का फैलाव अधिक है, वहां अक्सर रेत खनन के लिए ठेकेदारों के बीच खूनी संघर्ष तक देखे जा चुके हैं। खनन विभाग संभाल रहे मंत्री, अधिकारी और दूसरे राजनेता अपने करीबी लोगों को रेत खनन के ठेके दिलाने का प्रयास करते हैं। उत्तर प्रदेश में भी यही हुआ। एनजीटी की रोक के बाद रेत का कारोबार ठप्प पड़ गया तो ठेकेदारों ने राजनीतिक संपर्क से अवैध खनन शुरू किया। कायदे से रेत खनन के लिए ई-टेंडर के जरिए पट्टा दिया जाना था, पर मंत्रियों-अधिकारियों से मिलीभगत कर बहुत सारे ठेकेदारों ने अपना कारोबार जारी रखा। जाहिर है, इस तरह जब कोई धंधा राजनीतिक शह पर चलता है, तो मुनाफे का कुछ हिस्सा सत्ता पक्ष के लोगों तक भी पहुंचता है। छिपी बात नहीं है कि जिस दौरान अवैध खनन चल रहा था, उसे रोकने का प्रयास करने वाले कई अधिकारियों को अपनी जान तक से हाथ धोना पड़ा था। कई अधिकारियों के तबादले कर दिए गए थे, जिसे लेकर तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार को काफी किरकिरी झेलनी पड़ी थी।

सीबीआई के ताजा छापों को कुछ लोग राजनीतिक नजरिए से देख सकते हैं, पर हकीकत यह है कि अवैध रेत खनन के मामले पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सीबीआई जांच का आदेश दिया था। उसी तहत चली जांचों में मंत्रियों-अधिकारियों की संलिप्तता उजागर हुई है। इसलिए इस मामले को राजनीतिक रंग देने के बजाय पर्यावरण सुरक्षा की दृष्टि से देखने की जरूरत है। यह तथ्य उजागर है कि मनमाने ढंग से खनन के चलते उत्तर प्रदेश की कई नदियों के पाट बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुए हैं। इस तरह बरसात के समय उनकी दिशा अक्सर बदल जाया करती है, वे अपने तटबंध तोड़ कर खेतों, गांवों, वन क्षेत्रों आदि को तबाह कर दिया करती हैं। फिर नदियों का रेत सार्वजनिक संपत्ति है, उसका मनमाने ढंग से व्यापार करने की किसी को इजाजत नहीं दी जा सकती। मगर विचित्र है कि प्रशासन और सरकारें अपने स्वार्थ के चलते इस तकाजे को नजरअंदाज कर देती हैं।

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