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संपादकीय: बातचीत के रास्ते

यह कोई छिपा तथ्य नहीं है कि कश्मीर में संवादहीनता की स्थिति से पैदा होने वाले असंतोष का फायदा पाकिस्तानी ठिकानों से काम करने वाले लश्कर-ए-तैयबा जैसे कई आतंकी समूह उठाते हैं और युवाओं के सामने भ्रम परोस कर उन्हें अपनी ओर आकर्षित करते हैं।

Author November 7, 2018 2:14 AM
जम्मू कश्मीर में सेना के जवानों की फाइल फोटो।(image source-Ecpress photo by shuaib masoodi)

जम्मू-कश्मीर में समस्या अगर दिनोंदिन जटिल होती गई है तो उसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि आतंकवाद से निपटने के क्रम में वहां के आम लोग भी जद में आए और दोतरफा मोर्चे में वे नाहक हिंसा के शिकार हुए। हालांकि वहां के राजनीतिक दलों से लेकर हिंसा को ही अपना रास्ता मानने वाले समूहों से भी बातचीत की कोशिशें लंबे समय से चल रही हैं, लेकिन अभी तक उसमें कोई बड़ी कामयाबी नहीं मिल सकी है। संभव है कि बातचीत की दिशा में वैसी ठोस पहलकदमी नहीं हुई हो, जिसकी जरूरत रही है। इस लिहाज से देखें तो राज्य के राज्यपाल सत्यपाल मलिक का यह बयान उम्मीद जगाने वाला है कि प्रशासन अगले चार से छह महीने में सभी पक्षों के साथ बातचीत करने के लिए माहौल बनाने की कोशिश करेगा। राज्यपाल के मुताबिक पथराव और आतंकवाद संबंधी घटनाएं रुकी हैं, निकाय चुनाव शांतिपूर्वक संपन्न हुए और नीतियों के अच्छे परिणाम मिल रहे हैं। लेकिन यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि पिछले कुछ समय से कश्मीर में आतंकी हमलों में सुरक्षा बलों के कई जवानों की जान चली गई। जाहिर है, यह चिंताजनक स्थिति है, जिसके हल की ओर शासन को पहलकदमी करनी चाहिए।

यह सही है कि आतंकवाद से जूझते इस राज्य में कई बार ऐसे हालात पैदा हो जाते हैं, जहां किसी आतंकी हमले से निपटने के लिए सुरक्षा बलों को भी मोर्चा लेना पड़ता है। पर सच यह है कि अंतिम तौर पर बातचीत ही वह रास्ता है, जहां से किसी राजनीतिक और स्थायी हल तक पहुंचा जा सकता है। वहां की दो मुख्य क्षेत्रीय पार्टियां, नेशनल कांफ्रेंस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी स्थानीय जनता का प्रतिनिधित्व करने का दावा तो करती हैं, लेकिन राज्य में शांति कायम करने के मकसद से हिंसा में विश्वास करने वाले समूहों पर कोई असर डालने की स्थिति में नहीं हैं। बल्कि आतंकी हमलों और उनसे निपटने के लिए सुरक्षा बलों के अपनाए रास्तों पर वे कई बार ढुलमुल रवैया अख्तियार कर लेते हैं। यही वजह है कि वहां के हिंसक समूहों का मनोबल बढ़ जाता है। जबकि अगर राजनीतिक दल लोगों के सामने वास्तविक तस्वीर रखें तो स्थिति में बदलाव की उम्मीद की जा सकती है।

यह कोई छिपा तथ्य नहीं है कि कश्मीर में संवादहीनता की स्थिति से पैदा होने वाले असंतोष का फायदा पाकिस्तानी ठिकानों से काम करने वाले लश्कर-ए-तैयबा जैसे कई आतंकी समूह उठाते हैं और युवाओं के सामने भ्रम परोस कर उन्हें अपनी ओर आकर्षित करते हैं। यही वजह है कि वहां से कुछ उच्च शिक्षित नौजवानों के भी आतंकवादी समूहों में शामिल होने की खबरें आर्इं। निश्चित रूप से यह चिंता को बढ़ाने वाली बात है, क्योंकि ऐसे युवा बाकी भ्रमित लोगों के सामने एक विकल्प पेश कर देते हैं। जबकि इन साधारण लोगों से मुख्यधारा की राजनीति अगर संवाद बनाए तो आतंकी समूहों को कमजोर किया जा सकता है। हाल में ऐसी कई खबरें आर्इं, जिनमें कुछ अभिभावकों ने अपने उन बच्चों से अपील की कि वे आतंक का रास्ता छोड़ कर वापस आ जाएं। कुछ मामलों में इसका सकारात्मक असर भी देखा गया। लेकिन जरूरत इन्हीं इक्का-दुक्का उदाहरणों को आम बनाने की है, ताकि समस्या के दीर्घकालिक समाधान का रास्ता तैयार हो सके। इसके लिए समस्या के दायरे में आने वाले सभी समूहों से बातचीत का माहौल बनाने और भरोसा पैदा करने की जरूरत है।

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