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संपादकीय: पानी का प्रश्न

असम के हालात तो और गंभीर हैं, जहां सत्रह लाख लोगों को आर्सेनिक घुला पानी पीना पड़ रहा है। पश्चिम बंगाल में करीब पौने दो करोड़ लोगों को इस तरह का जहरीला पानी मिल रहा है। देश भर में ऐसा दूषित जल पीने वालों का आंकड़ा सैंतालीस करोड़ के पार है।

Author May 1, 2018 4:12 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

देश की आबादी का बड़ा हिस्सा गंदा पानी पीने को मजबूर है। हालात इतने गंभीर इसलिए हो गए कि देश के ज्यादातर हिस्सों में जमीन के भीतर का पानी गंदा और जहरीला हो चुका है। भू-जल में फ्लोराइड, आर्सेनिक, लौह और नाइट्रेट जैसे तत्त्वों, लवणों और भारी धातुओं की मात्रा इस कदर बढ़ चुकी है कि ऐसे पानी को पीने वाले गंभीर बीमारियों के शिकार होते जा रहे हैं। इससे त्वचा संबंधी रोग, सांस की बीमारियां, हड्डियां कमजोर पड़ना, गठिया और कैंसर जैसे रोग दस्तक दे रहे हैं। जिन राज्यों में ज्यादातर लोग गंदा और जहरीला पानी को विवश हैं उनमें पश्चिम बंगाल, असम और राजस्थान सबसे ऊपर हैं। देश में पानी की गुणवत्ता को लेकर ‘एकीकृत प्रबंधन सूचना प्रणाली’ (आइएमआइएस) ने जो आंकड़े पेश किए हैं वे चौंकाने वाले हैं। राजस्थान में सतहत्तर लाख से ज्यादा लोग दूषित पानी पीने को मजबूर हैं और इससे होने वाली बीमारियों से जूझ रहे हैं। राजस्थान के बड़े हिस्से में पानी में फ्लोराइड, नाइट्रेट और दूसरे लवण हैं। इनमें इकतालीस लाख लोग फ्लोराइड, अट्ठाईस लाख से ज्यादा लोग लवणयुक्त पानी और आठ लाख से ज्यादा लोग नाइट्रेट युक्त पानी पी रहे हैं।

असम के हालात तो और गंभीर हैं, जहां सत्रह लाख लोगों को आर्सेनिक घुला पानी पीना पड़ रहा है। पश्चिम बंगाल में करीब पौने दो करोड़ लोगों को इस तरह का जहरीला पानी मिल रहा है। देश भर में ऐसा दूषित जल पीने वालों का आंकड़ा सैंतालीस करोड़ के पार है। तब सवाल उठता है क्या पीने का साफ पानी कभी नसीब हो भी पाएगा या नहीं? लोगों को साफ पानी मुहैया कराने की क्या सरकारों की कोई जिम्मेदारी नहीं है? क्या यह सरकार की प्राथमिकता नहीं होनी चाहिए? देश आज पीने के पानी और साफ पानी की जिस समस्या से जूझ रहा है, उसकी जड़ें जल प्रबंधन में हमारी घोर नाकामी में देखी जा सकती हैं। दो समस्याएं हैं। एक, पानी नहीं है। और दूसरी यह कि जहां पानी है वह पीने लायक नहीं है।

बारिश के पानी को संग्रहीत और संरक्षित करने का कोई ठोस तंत्र हम आज तक विकसित नहीं कर पाए हैं, जबकि आज भी यह परंपरा का हिस्सा माना जाता है। कहने को पेयजल के मसले पर कितनी ही योजनाएं-परियोजनाएं बनीं, लेकिन जल संकट से मुक्ति नहीं मिली। यह इस बात का प्रमाण है कि इन योजनाओं पर ठोस तरीके से अमल नहीं हुआ। हालांकि केंद्र सरकार राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल योजना के तहत राज्य सरकारों को पानी की गुणवत्ता सुधारने के लिए तकनीकी और आर्थिक मदद मुहैया करा रही है। लेकिन ये काम बहुत मंथर गति से हो रहे हैं, जबकि समस्या काफी तेजी से बढ़ रही है।

भू-जल दूषित होने का सबसे बड़ा कारण कारखानों और फैक्ट्रियों से निकलने वाले जहरीले अपशिष्टों का जमीन के भीतर रिसाव है। समय-समय पर सर्वोच्च अदालत ने इन औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले अपशिष्टों के बहाव पर रोक लगाने के लिए राज्यों को सख्त निर्देश भी दे रखे हैं, लेकिन कुछ को छोड़ दें तो ज्यादातर जगहों पर ये बेअसर ही साबित हुए हैं। ग्रामीण इलाकों में संकट ज्यादा गंभीर है। केवल हैंडपंप लगा देना काफी नहीं है; पानी पीने लायक भी हो, यह सुनिश्चित करना भी आखिर सरकारों की जिम्मेदारी है।

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