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संपादकीय: रुपए का रुख

विदेशी मुद्रा भंडार चार सौ अरब डॉलर से नीचे आ गया। इसके अलावा भारत का चालू खाते का घाटा लगातार बढ़ रहा है और सरकार के लिए इसे तीन फीसद तक समेटना मुश्किल हो रहा है।

Author October 5, 2018 2:32 AM
प्रतिकात्मक तस्वीर।(Express Photo by Praveen Khanna/Files)

रुपए का रुख डॉलर के मुकाबले लगातार नीचे की ओर बने रहने से सरकार के लिए अर्थव्यवस्था को संभालने की चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं। भारतीय मुद्रा पहली बार तिहत्तर रुपए के पार पहुंच गई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें इसकी बड़ी वजह बताई जा रही हैं। पिछले नौ महीनों में कच्चे तेल की कीमतें चौंसठ से बढ़ कर पचासी डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं। अभी इनके और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। ईरान पर अमेरिकी दबाव और ओपेक देशों की तेल आपूर्ति के प्रति अनिच्छा को देखते हुए इसके सौ डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने के कयास लगाए जा रहे हैं। यानी रुपए की कीमत और नीचे जाने की आशंका है। सरकार ने पिछले महीने उन्नीस वस्तुओं के आयात शुल्क में बढ़ोतरी कर रुपए की कीमत गिरने से रोकने का प्रयास किया था, पर वह भी बेअसर साबित हो रहा है। अब इसे प्रवासी भारतीय जमा योजना के जरिए मजबूत करने की योजना बनाई जा रही है। यानी प्रवासी भारतीयों को भारत में डॉलर जमा करने को प्रोत्साहित करने पर विचार किया जा रहा है, ताकि रुपए का रुख कुछ ऊपर की ओर हो सके।

दरअसल, रुपए की कीमत गिरने के पीछे कुछ बड़ी वजहें हैं। एक तो यह कि तेल की बढ़ती और रुपए की गिरती कीमतों की वजह से भारतीय शेयर बाजार का रुख भी नीचे की तरफ है। उधर अमेरिका ने जमा खाते की ब्याज दर बढ़ा दी है, इसके चलते बहुत सारे विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से अपना पैसा निकाल लिया। नतीजतन, विदेशी मुद्रा भंडार चार सौ अरब डॉलर से नीचे आ गया। इसके अलावा भारत का चालू खाते का घाटा लगातार बढ़ रहा है और सरकार के लिए इसे तीन फीसद तक समेटना मुश्किल हो रहा है। इस तरह रुपए को मजबूत स्थिति में ला पाने के लिए सरकार के सामने चुनौतियां कई हैं। अगर कच्चे तेल की कीमतें काबू में आ जाएं तो इसके सुधरने की उम्मीद की जा सकती है, पर इसके आसार नजर नहीं आते। यों सरकार ने देश में तेल की कीमतों को संतुलित करने की मंशा से वैट की दरें कम करने का एलान किया है, पर इससे उपभोक्ताओं को जरूर मामूली राहत मिल सकती है, लेकिन रुपए की कीमत संतुलित करने का दावा नहीं किया जा सकता।

जब रुपए की कीमत गिरती है, तो उससे कई स्तरों पर परेशानियां बढ़ जाती हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में लेनदेन चूंकि डॉलर में करना होता है, इसलिए सरकार को चीजों की कीमत अधिक चुकानी पड़ती है। अंतरराष्ट्रीय कर्ज का ब्याज बढ़ जाता है। व्यापारियों को वस्तुओं की कीमतें अधिक चुकानी पड़ती हैं, इस तरह महंगाई बढ़ती है। कच्चे तेल के लिए भी अधिक रुपया खर्च करना पड़ता है। ऐसे में वैट की दरें घटाने से कीमतों पर बहुत असर नहीं पड़ता। फिलहाल इस समस्या से पार पाने का एक ही रास्ता बचता है कि देश में विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाया जाए। वह कैसे संभव होगा, सरकार को सोचना है। सिर्फ प्रवासी भारतीयों के निवेश से शायद ही इस दिशा में अपेक्षित कामयाबी मिले। घरेलू बाजार की स्थिति डावांडोल होने की वजह से विदेशी प्रत्यक्ष निवेश आकर्षित कर पाना मुश्किल बना हुआ है। जिन पहलुओं पर सरकार को पहले से फूंक-फूंक कर कदम उठाने की जरूरत थी, उन पर अब ध्यान देने से स्थिति सुधरने में वक्त लगेगा।

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