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संपादकीय: रैगिंग का रोग

सुप्रीम कोर्ट की ओर से सभी शिक्षण संस्थानों के लिए यह सख्त निर्देश है कि अगर वहां रैगिंग की घटना हुई तो इसके लिए उन्हें भी जवाबदेह माना जाएगा। हर उच्च शिक्षा संस्थान में रैगिंग के खिलाफ एक समिति बनाने से लेकर संबंधित नियमों का पालन नहीं करने पर संस्थान की मान्यता रद्द कर देने तक की बात है।

Author September 1, 2018 6:22 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है।

शिक्षण संस्थानों में रैगिंग पर पूरी तरह रोक लगाने के लिए लागू किए गए नियम-कायदों के बावजूद आज भी आए दिन इस तरह की घटनाएं सामने आ रही हैं। हालांकि इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट तक ने बेहद सख्त रुख अख्तियार किया है और यह निर्देश है कि किसी भी रूप में रैगिंग होने पर आरोपी से लेकर संस्थान तक के खिलाफ कार्रवाई होगी। लेकिन यह समझना मुश्किल है कि कुछ संस्थानों में वरिष्ठ माने वाले छात्रों के भीतर कौन-सी सामंती ग्रंथि बैठी होती है कि वे सारे नियम-कायदों को धता बता कर वहां आए नए विद्यार्थियों को परेशान करने से नहीं चूकते। ताजा मामला इलाहाबाद के मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज से सामने आया है, जहां एमबीबीएस पाठ्यक्रम के पहले वर्ष में दाखिला लेने वाले सौ से ज्यादा विद्यार्थियों के साथ रैगिंग के नाम पर अमानवीय सलूक किया गया। वहां जूनियर डॉक्टरों को इस बात के लिए मजबूर किया गया कि वे घुटनों के बल चल कर सभी वरिष्ठों सहित कर्मचारियों को सलाम करें। छात्राओं को भी परेशान किया गया। जिन्होंने इस रैगिंग का विरोध किया, उनकी पिटाई की गई और शिकायत करने पर उनका भविष्य चौपट कर देने की धमकी दी गई। पीड़ित विद्यार्थियों के बीच वरिष्ठों के खौफ का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है किसी ने भी कॉलेज की रैगिंग निरोधक सेल से इस घटना की शिकायत नहीं की।

किसी तरह जब खबर सामने आई तो इस पर खुद संज्ञान लेते हुए मानवाधिकार आयोग ने केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय और उत्तर प्रदेश सरकार के अलावा मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य को नोटिस जारी किया है। लेकिन सवाल है कि इस समस्या पर लगातार चिंता जताए जाने, आरोपियों या दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई जैसी व्यवस्था के बावजूद उच्च शिक्षा संस्थानों में रैगिंग की घटनाएं क्यों नहीं रुक रही हैं। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से सभी शिक्षण संस्थानों के लिए यह सख्त निर्देश है कि अगर वहां रैगिंग की घटना हुई तो इसके लिए उन्हें भी जवाबदेह माना जाएगा। हर उच्च शिक्षा संस्थान में रैगिंग के खिलाफ एक समिति बनाने से लेकर संबंधित नियमों का पालन नहीं करने पर संस्थान की मान्यता रद्द कर देने तक की बात है। इसके बावजूद अगर कुछ शिक्षा संस्थानों में नए विद्यार्थियों को रैगिंग की मार झेलनी पड़ रही है तो यह न केवल संस्थानों की लापरवाही और नियम-कायदों को ताक पर रखने का मामला है, बल्कि यह वरिष्ठ कहे जाने वाले विद्यार्थियों के सामाजिक बर्ताव पर भी सवालिया निशान है।

इसमें कोई शक नहीं कि पिछले कुछ वर्षों में शिक्षा संस्थानों में रैगिंग की वजह से पीड़ित विद्यार्थियों की तकलीफदेह दास्तान से लेकर आत्महत्या तक कर लेने की घटनाएं सामने आने के बाद जागरूकता बढ़ी है। सामाजिक स्तर पर इसका विरोध भी हुआ है। मगर हैरानी की बात है कि जिस दौर में शिक्षण संस्थानों में मानवीय और संवेदनशील व्यवहार की सबसे ज्यादा जरूरत महसूस की जा रही है, उस वक्त में भी रैगिंग के नाम पर नवागंतुकों को अपने साथ इस तरह के बर्ताव का सामना करना पड़ रहा है। कोई विद्यार्थी जब पहली बार किसी संस्थान में दाखिला लेता है तो वहां उसके साथ हुए शुरुआती व्यवहार का गहरा असर उसके मन-मस्तिष्क पर पड़ता है। यहां तक कि कई बार इससे जीवन और समाज के प्रति उनकी दृष्टि सकारात्मक या फिर नकारात्मक हो जाती है। इसलिए किसी भी शिक्षण संस्थान में यह सुनिश्चित किए जाने की जरूरत है कि वहां पहली बार आए विद्यार्थियों को ऐसा व्यवहार मिले, जिससे न केवल उनके अपने व्यक्तित्व में सकारात्मक निखार आए, बल्कि इसका लाभ देश और समाज को भी मिले।

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