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संपादकीय: हादसों की पटरी

मगर रेल महकमे के पास जरूरी कामों के लिए भी कर्मचारियों की कमी देखी जाती है। ऐसे में रेल की पटरियों के किनारे पशु चराने वालों या अपने मवेशियों को पटरियों पर खुला घूमने के लिए छोड़ देने वाले पशु मालिकों पर नजर रखने में उसे कितनी कामयाबी मिल पाएगी, कहना मुश्किल है।

Author Published on: September 21, 2018 2:32 AM
प्रतिकात्मक तस्वीर।

रेल की पटरियों पर पशुओं और स्थानीय लोगों के आ जाने से अक्सर हादसे हो जाते हैं। इसके बावजूद न तो रेल प्रशासन कोई व्यावहारिक कदम उठा पाता है और न लोग खुद एहतियात बरतने का प्रयास करते देखे जाते हैं। उत्तर पश्चिम रेलवे मंडल ने आंकड़ा दिया है कि इस साल अगस्त तक रेल की पटरियों पर पशुओं के आने की छह सौ सात घटनाएं हुर्इं, जिनकी वजह से नौ सौ पांच गाड़ियां प्रभावित हुर्इं। यह आंकड़ा सिर्फ एक मंडल का है, इसलिए अंदाजा लगाया जा सकता है कि पूरे देश में इस तरह की कितनी दुर्घटनाएं हुई होंगी। इसके चलते कितनी गाड़ियों का आवागमन बाधित हुआ होगा। पिछले तीन वर्षों में हुई ऐसी घटनाओं में पशुओं के टकराने से दो गाड़ियों के पटरी से उतरने जैसा हादसा भी हो चुका है। रेलवे ने कहा है कि पशुओं के टकराने से न सिर्फ गाड़ियों का आवागमन बाधित होता है, बल्कि उनके इंजन को भी नुकसान पहुंचता है। इसलिए रेलवे ने लोगों को जागरूक बनाने और पशु मालिकों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करने का मन बनाया है।

करीब दो महीने पहले दिल्ली के बिल्कुल करीब नरेला में स्टेशन के पास पटरियों पर गायों का झुंड आ गया और कालका शताब्दी से टकरा कर बीस गायों की ठौर मौत हो गई। उसके चलते उस तरफ आने-जाने वाली गाड़ियां घंटों रुकी रहीं। जंगली इलाकों से होकर गुजरने वाली रेल लाइनों पर अक्सर वन्य जीवों के आने और गाड़ियों से टकरा कर मौत के मुंह में चले जाने की घटनाएं हो जाती हैं, पर जिन इलाकों में लोग अपने मवेशी खुद चराने ले जाते हैं, वे भी पटरियों पर उन्हें जाने से नहीं रोकते, तो यह निस्संदेह उनकी लापरवाही और नियम-कायदों की अनदेखी है। कई बार लोग स्टेशनों पर बने पुलों का उपयोग कर एक से दूसरे प्लेटफार्म पर जाने के बजाय पटरियों पर से होकर दूसरी तरफ जाना ज्यादा सुविधाजनक समझते हैं। ऐसे में अक्सर दुर्घटना हो जाती है। हालांकि ऐसी मनमानी के खिलाफ दंड और जुर्माने का प्रावधान है, पर नियम-कायदों की अनदेखी करने के आदी लोग पटरियों से होकर गुजरना या उनके किनारे अपने मवेशी चराना, बिना फाटक वाली जगहों से रेल लाइनों पर से गाड़ी निकाल लेना बहादुरी समझते हैं। रेलवे ने ऐसी मनमानी पर सख्त रुख अख्तियार करने का मन बनाया है, तो इससे जरूर कुछ बेहतर नतीजे की उम्मीद जगी है।

मगर रेल महकमे के पास जरूरी कामों के लिए भी कर्मचारियों की कमी देखी जाती है। ऐसे में रेल की पटरियों के किनारे पशु चराने वालों या अपने मवेशियों को पटरियों पर खुला घूमने के लिए छोड़ देने वाले पशु मालिकों पर नजर रखने में उसे कितनी कामयाबी मिल पाएगी, कहना मुश्किल है। यह लंबे समय से सिफारिश की जाती रही है कि जहां-जहां गांवों-कस्बों, रिहाइशी इलाकों से होकर रेल लाइनें गुजरती हैं, वहां कंटीले तार की मजबूत बाड़ लगाई जानी चाहिए, ताकि पटरियों पर मवेशी और लोग न आ सकें। मगर जब शहरी क्षेत्रों में रेल लाइनों को सुरक्षित नहीं बनाया जा सका है, तो दूर-दराज के इलाकों की क्या बात की जाए! ऐसा नहीं माना जा सकता कि रेल लाइनों के किनारे बाड़ लगाना कठिन काम है। देश भर में ऐसी व्यवस्था करना जरूरी नहीं, पर खतरनाक जगहों को चिह्नित कर चरणबद्ध तरीके से बाड़ लगाना मुश्किल काम नहीं। यह दुर्घटना की वजह से रेलवे को होने वाले नुकसान से कम ही खर्च होगा।

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