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संपादकीय : वृद्धि के मायने

वित्तवर्ष 2017-18 के पूरे साल के प्रदर्शन और अंतिम तिमाही के प्रदर्शन के बीच जो फर्क दिखता है, आर्थिक मामलों के कई जानकार उसकी वजह नोटबंदी और जीएसटी को मानते हैं। नवंबर 2016 में नोटबंदी हुई। उसका असर 2017 में भी महीनों तक रहा, कृषि समेत असंगठित क्षेत्र और लघु व मझोले उद्योगों का कामकाज महीनों तक मंदा रहा।

Author June 2, 2018 3:31 AM
वित्तवर्ष 2017-18 की चौथी तिमाही (जनवरी-मार्च) में जीडीपी यानी सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 7.7 फीसद रही।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के चढ़े दामों की वजह से चिंतित सरकार ने जीडीपी के ताजा आंकड़ों को लेकर राहत महसूस की होगी। केंद्रीय सांख्यिकी संगठन ने गुरुवार को जो आंकड़े जारी किए वे बताते हैं कि वित्तवर्ष 2017-18 की चौथी तिमाही (जनवरी-मार्च) में जीडीपी यानी सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 7.7 फीसद रही। यह आंकड़ा कितना उत्साहजनक है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पिछली सात तिमाहियों में यह जीडीपी का सर्वोच्च स्तर है। लेकिन यह भी ध्यान रहे कि यह सिर्फ एक तिमाही का प्रदर्शन है। चौथी तिमाही में 7.7 फीसद की वृद्धि दर दर्ज करने के बावजूद 2017-18 के पूरे वित्तवर्ष में वृद्धि दर 6.7 फीसद रही, जो कि राजग सरकार के चार वर्षों में सबसे कम है। फिर भी, पिछले वित्तवर्ष की अंतिम तिमाही के प्रदर्शन से उत्साहित होकर सरकार ने अगले वित्तवर्ष में साढ़े सात फीसद की वृद्धि दर हासिल करने के अपने विश्वास को एक बार फिर दोहराया है। अगर अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों के हिसाब से देखें तो जनवरी से मार्च के बीच सबसे उत्साहजनक बढ़ोतरी कृषि, मैन्युफैक्चरिंग तथा निर्माण क्षेत्र में हुई- कृषि में 4.5 फीसद, मैन्युफैक्चरिंग में 9.1 फीसद और निर्माण में 11.5 फीसद।

वित्तवर्ष 2017-18 के पूरे साल के प्रदर्शन और अंतिम तिमाही के प्रदर्शन के बीच जो फर्क दिखता है, आर्थिक मामलों के कई जानकार उसकी वजह नोटबंदी और जीएसटी को मानते हैं। नवंबर 2016 में नोटबंदी हुई। उसका असर 2017 में भी महीनों तक रहा, कृषि समेत असंगठित क्षेत्र और लघु व मझोले उद्योगों का कामकाज महीनों तक मंदा रहा। जुलाई 2017 में जीएसटी लागू हुआ और इससे मेल बिठाने में उद्यमियों और कारोबारियों को वक्त लगा। बहरहाल, जनवरी-मार्च के आंकड़े इसी ओर इशारा करते हैं कि अर्थव्यवस्था अब नोटबंदी और जीएसटी के झटकों से उबर चुकी है। तो क्या यह माना जाए कि चौथी तिमाही के आंकड़े एक रुझान को प्रदर्शित कर रहे हैं और मौजूदा वित्तवर्ष का प्रदर्शन इसी के अनुरूप होगा? सरकार का दावा तो यही है। पर कई अर्थशास्त्री मानते हैं कि चौथी तिमाही के नतीजे सरकार के स्तर पर किए गए अधिक खर्च और निवेश की देन हैं, जब तक निजी क्षेत्र नए निवेश के लिए उत्साह नहीं दिखाता, हम भविष्य को लेकर बहुत आश्वस्त नहीं हो सकते। फिर, इस समय सरकार के सामने अर्थव्यवस्था से जुड़े कई गंभीर सवाल हैं जिनकी अनदेखी नहीं की जा सकती। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के चढ़े हुए दाम ने एक तरफ चालू खाते का घाटा बढ़ने का खतरा पैदा किया है तो दूसरी तरफ महंगाई बढ़ने का।

रुपए का अवमूल्यन रिकार्ड स्तर पर पहुंच गया है, एक डॉलर की कीमत 68 रुपए से कुछ अधिक हो चुकी है और एक डॉलर सत्तर रुपए के स्तर को भी पार सकता है। मार्च 2014 में बैंकों का एनपीए 4.1 फीसद था, जो सितंबर 2017 में 10.2 फीसद पर पहुंच गया। ऊंची वृद्धि दर आने पर यह सवाल उठना चाहिए कि उस तिमाही या उस वर्ष में रोजगार सृजन कितना हुआ? वृद्धि दर के मुताबिक रोजगार के मौके क्यों नहीं बढ़ रहे हैं? एक सवाल कृषि से संबंधित भी पूछा जाना चाहिए। कृषि क्षेत्र में चार फीसद से अधिक की वृद्धि दर हासिल हो, तो उसे शानदार उपलब्धि मानते हैं। पर सवाल है कि इस वृद्धि दर से किसानों को क्या मिला है? क्या उन्हें अपनी फसलों के बेहतर दाम मिले हैं? किसानों में बड़े पैमाने पर असंतोष क्यों दिख रहा है?

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