jansatta Editorial artical Mahabali's arbitrary opinion about America withdraws from nuclear bomb deal with Iran - संपादकीय: महाबली की मनमानी - Jansatta
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संपादकीय: महाबली की मनमानी

अमेरिका और ईरान के बीच जिनेवा में 2015 में हुए इस समझौते का मकसद ईरान का परमाणु कार्यक्रम सीमित करना था। यानी शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए तो ईरान के परमाणु रिएक्टर चलें, लेकिन परमाणु बम नहीं बनाया जाए। यह समझौता ईरान को घेरने का बड़े देशों का अभियान था।

Author May 10, 2018 4:38 AM
JCPOA ईरान परमाणु संधि से हाथ खींचने की उद्घोषणा पर हस्‍ताक्षर करते अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप। (फोटो: रॉयटर्स)

ईरान को परमाणु बम बनाने से रोकने के लिए अमेरिका ने मित्र देशों के साथ मिल कर ईरान से जो करार किया था, उससे वह पीछे हट गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संयुक्त कार्यवाही के लिए कार्ययोजना यानी जेसीपीओए से अलग होने और ईरान पर फिर से प्रतिबंध थोपने का जो एकतरफा फैसला किया है, उससे वैश्विक समुदाय सकते में है। ट्रंप का यह कदम दुनिया को नए तनाव में झोंकने वाला है। ईरान भी अमेरिका की कार्रवाई से बौखलाया है। इस समझौते पर हस्ताक्षर करने वालों में अमेरिका के अलावा ब्रिटेन, फ्रांस, चीन, रूस और जर्मनी और यूरोपीय संघ शामिल थे। करीब डेढ़ दशक तक ईरान के साथ तनावपूर्ण रिश्तों और वार्ताओं के कई दौर के बाद यह करार हो पाया था। ट्रंप ने ईरान को कट्टरपंथी देश बताते हुए सीरिया में युद्ध भड़काने का आरोप लगाया है। ट्रंप का कहना है कि ईरान समझौते का पालन नहीं कर रहा है। हालांकि ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, चीन और जर्मनी ने अमेरिका के इस कदम से असहमति जताई है और ईरान के साथ हुए समझौते को जारी रखने का फैसला किया है। ट्रंप ने ईरान को लेकर जो हठधर्मिता भरा रुख दिखाया है, वह नए खतरे की आहट है। साफ है कि ट्रंप का यह कदम ईरान को घेरने की तैयारी है।

अमेरिका और ईरान के बीच जिनेवा में 2015 में हुए इस समझौते का मकसद ईरान का परमाणु कार्यक्रम सीमित करना था। यानी शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए तो ईरान के परमाणु रिएक्टर चलें, लेकिन परमाणु बम नहीं बनाया जाए। यह समझौता ईरान को घेरने का बड़े देशों का अभियान था। अमेरिका और ईरान के रिश्ते दशकों तक तनावपूर्ण रहे और इस दौरान दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध भी नहीं रहे। समझौता न करने की वजह से ईरान को वर्षों कड़े आर्थिक प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा। इस समझौते के तहत ईरान को अपने उच्च संवर्धित यूरेनियम भंडार का अट्ठानबे फीसद हिस्सा नष्ट करने और मौजूदा परमाणु सेंट्रीफ्यूज में से दो तिहाई को भी हटाने की बात थी। समझौते में कहा गया था कि संयुक्तराष्ट्र के निरीक्षक ईरान के सैन्य प्रतिष्ठानों की निगरानी करेंगे। इसके अलावा ईरान के हथियार खरीदने पर पांच साल और मिसाइल बनाने पर प्रतिबंध आठ साल तक रहना था। समझौते पर हस्ताक्षर के बदले ईरान को तेल और गैस के कारोबार, वित्तीय लेन-देन, उड्डयन और जहाजरानी के क्षेत्र में लागू प्रतिबंधों में ढील देने की बात कही गई थी।

लेकिन ट्रंप के फैसले से सारा गणित पलट गया है। ईरान के साथ समझौते को लेकर सुरक्षा परिषद के सदस्य देशों में जैसी गुटबाजी हो गई है, वह वैश्विक राजनीति के लिए अच्छा संकेत नहीं है। इससे नए समीकरण बनेंगे। चीन और रूस तो शुरू से ही ईरान के साथ हैं। पर ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और यूरोपीय संघ ने समझौता जारी रख कर अमेरिका को यह संदेश दिया है कि हर मुद्दे पर उसकी हां में हां मिलाना संभव नहीं है। इसे ईरान को इन देशों का मजबूत समर्थन ही माना जाना चाहिए। ईरान ने भी इन देशों के साथ समझौता बनाए रखने की बात कही है। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजंसी ने भी कहा है कि ईरान में 2009 के बाद से परमाणु हथियार विकसित करने की गतिविधियों के कोई संकेत नहीं मिले हैं और ईरान समझौते के हिसाब से काम कर रहा है। ऐसे में समझौते से अमेरिका का हटना वाजिब नहीं कहा जा सकता।

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