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संपादकीय: किसान की सुध

कुछ महीनों बाद कई राज्यों के विधानसभा चुनाव होने हैं और अगले लोकसभा चुनाव में भी एक साल से कम वक्त बचा है। ऐसे में, सरकार को लगा होगा कि किसानों की नाराजगी को नजरअंदाज करना राजनीतिक रूप से काफी जोखिम-भरा साबित हो सकता है।

Author July 6, 2018 01:38 am
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फोटो सोर्स- पीटीआई)

बुधवार को केंद्र सरकार ने धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में दो सौ रुपए प्रति क्विटंल की बढ़ोतरी समेत चौदह खरीफ फसलों के एमएसपी के नए प्रस्तावों को मंजूरी दे दी। इसी के साथ, सरकार ने दावा किया है कि उसने किसानों को उनकी उपज का लागत से डेढ़ गुना दाम देने का अपना वायदा पूरा कर दिया है। इसमें दो राय नहीं कि पिछले चार साल में एमएसपी में यह सबसे ज्यादा बढ़ोतरी है, लेकिन इसे स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों का क्रियान्वयन कहना सही नहीं होगा। इससे पहले, धान के एमएसपी में सबसे ज्यादा, एक सौ सत्तर रुपए प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी यूपीए सरकार ने 2012-13 में की थी। लेकिन बाद के वर्षों में वृद्धि का यह स्तर कायम नहीं रहा। राजग सरकार ने तो महज पचास से अस्सी रुपए की बढ़ोतरी की। जहां तक चुनावी वायदे का सवाल है, राजग सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में हलफनामा देकर कहा था कि कृषि पैदावार का लागत से डेढ़ गुना दाम देना संभव नहीं है। अब वही सरकार एमएसपी की नई घोषणा को अपने वायदे पर अमल बता रही है! आखिर उसे इसकी जरूरत क्यों महसूस हुई? वजह साफ है। पिछले एक साल में देश के अनेक हिस्सों में किसान आंदोलन उभरे हैं और उनकी मुख्य मांग स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश को लागू करने यानी फसल का ड्योढ़ा दाम दिलाने की रही है।

कुछ महीनों बाद कई राज्यों के विधानसभा चुनाव होने हैं और अगले लोकसभा चुनाव में भी एक साल से कम वक्त बचा है। ऐसे में, सरकार को लगा होगा कि किसानों की नाराजगी को नजरअंदाज करना राजनीतिक रूप से काफी जोखिम-भरा साबित हो सकता है। बेशक, एमएसपी की ताजा घोषणा किसानों की एक छोटी-सी जीत है। लेकिन कई कारणों से किसानों का असंतोष जल्दी ही फिर सतह पर दिखाई देने लगेगा। एक तो यह कि चार साल तक एमएसपी में मामूली वृद्धि ही होती रही। अगर पिछले चार साल में हर साल पर्याप्त वृद्धि हुई होती, तो उनके मुकाबले संतोषजनक बढ़ोतरी करने के लिए सरकार को और अधिक एमएसपी मंजूर करना पड़ता। दूसरे, किसानों की यह मांग रही है, और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश भी यही थी कि सी-2 पद्धति से लागत जोड़ी जाए, जिसमें जमीन का किराया और पारिवारिक श्रम, सबकुछ शामिल हो। लेकिन लागत का आकलन करते वक्त कई खास चीजें छोड़ दी गर्इं तथा बिजली व मजदूरी की बढ़ी हुई दरों और डीजल आदि की महंगाई का भी ध्यान नहीं रखा गया। फिर, अभी तक ऐसी व्यवस्था नहीं बन पाई है जिसमें यह गारंटी हो कि घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद हो ही जाएगी। गेहूं, धान, बाजरा आदि दो-चार फसलों को छोड़ दें, तो बाकी उपज की एमएसपी पर खरीद शायद ही हो पाती है।

एमएसपी की घोषणा के बाद भी, कई जगह उस दर पर खरीद के लिए किसानों को आंदोलन करना पड़ता है। मसलन, पिछले साल मध्यप्रदेश में यही हुआ, एमएसपी न मिलने से नाराज किसान सड़कों पर उतर आए। हाल में हरियाणा में सरसों की खरीद के लिए किसानों को आंदोलन करना पड़ा। स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश पर अमल सही मायने में तभी माना जाएगा जब कृषि पैदावार की लागत का हिसाब सी-2 पद्धति से जोड़ा जाए। फिर, उस लागत पर पचास फीसद जोड़ कर उपज का दाम तय किया जाएगा, और साथ ही यह सुनिश्चित किया जाएगा कि सभी किसानों को वह दाम मिले। अगर उपज उस निर्धारित मूल्य पर सरकारी खरीद में नहीं आ पाती है, और किसान को फसल व्यापारी के हाथ बेचनी पड़ती है- जो कि बहुत सारे मामलों में होगा ही- तो घोषित मूल्य और किसान को बाजार में मिले वास्तविक मूल्य के बीच जो फर्क हो, यानी किसान को जो नुकसान हो, उसकी भरपाई की व्यवस्था सरकार करे। इसके बगैर, किसानों की मांग मंजिल पर नहीं पहुंचेगी।

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