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संपादकीय : सेहत का सूचकांक

अध्ययन के मुताबिक स्वास्थ्य सुविधाओं तक लोगों की पहुंच और इन सुविधाओं की गुणवत्ता, दोनों कसौटियों पर, 195 देशों की सूची में भारत 145वें स्थान पर है। सूची यह भी बताती है कि भारत इस मामले में न केवल चीन बल्कि बांग्लादेश, श्रीलंका और भूटान जैसे अन्य पड़ोसियों से भी पीछे है।

Author May 25, 2018 3:03 AM
इस तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

बरसों से बहुत-से लोगों की यह राय रही है कि विकास दर के आंकड़े न तो अनिवार्य रूप से आम लोगों की आर्थिक प्रगति को दर्शाते हैं और न ही उनके जीवन में संतुष्टि को। इसलिए जीडीपी के बजाय जन-स्वास्थ्य, आम लोगों की आर्थिक सुरक्षा, सामाजिक शांति, स्वास्थ्य, सौहार्द तथा प्रसन्नता जैसे मानकों को विकास की कसौटी बनाया जाना चाहिए। उपर्युक्त आलोचना और वैकल्पिक मानकों को अपनाने के सुझाव का औचित्य जाहिर है। हम देखते हैं कि भारत में डेढ़-दो दशक से जीडीपी की ऊंची वृद्धि दर के बावजूद करीब चालीस फीसद बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। पिछले ढाई दशक में तीन लाख से ज्यादा किसान खुदकुशी कर चुके हैं और यह सिलसिला अब भी जारी है। करोड़ों युवा बेरोजगार हैं, और एक रिक्त पद के लिए हजारों लोग आवेदन करते हैं। इसलिए यह हैरत की बात नहीं कि जब संयुक्त राष्ट्र मानव विकास रिपोर्ट या विश्व भुखमरी सूचकांक या प्रसन्नता सूचकांक जैसी रिपोर्टें आती हैं, तो भारत की स्थिति जीडीपी के सुनहरे दावों से एकदम विपरीत नजर आती है। यही हकीकत स्वास्थ्य से सरोकार रखने वाली विश्वप्रसिद्ध पत्रिका ‘लांसेट’ के एक अध्ययन से भी सामने आई है।

इस अध्ययन के मुताबिक स्वास्थ्य सुविधाओं तक लोगों की पहुंच और इन सुविधाओं की गुणवत्ता, दोनों कसौटियों पर, 195 देशों की सूची में भारत 145वें स्थान पर है। सूची यह भी बताती है कि भारत इस मामले में न केवल चीन बल्कि बांग्लादेश, श्रीलंका और भूटान जैसे अन्य पड़ोसियों से भी पीछे है। हालांकि ग्लोबल ‘बर्डन आॅफ डिजीज’ नामक यह अध्ययन यह भी कहता है कि पहले के मुकाबले भारत की स्थिति में सुधार दर्ज हुआ है। वर्ष 1990 में इसे जहां 24.7 अंक मिले थे, वहीं वर्ष 2016 में इसे 41.2 अंक मिले। लेकिन इस कथित सुधार का दूसरा पहलू यह है कि अधिकतम और न्यूनतम अंकों के बीच का अंतर काफी बढ़ गया है, जो स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में देश में लगातार बढ़ रही गैर-बराबरी को ही दर्शाता है। भारत के राज्यों में केरल और गोवा को सबसे ज्यादा अंक मिले, यानी उनकी स्थिति बाकी राज्यों से अच्छी है, जबकि उत्तर प्रदेश और असम सबसे निचले पायदान पर हैं। जब जापानी बुखार से कई बच्चों की मौत हो जाती है और सरकारी काहिली सामने आती है, तो उपर्युक्त अध्ययन में उभरे तथ्यों से कैसे इनकार किया जा सकता है! जीवन-रक्षा और जन-स्वास्थ्य किसी भी सरकार के लिए सबसे बड़ा तकाजा होना चाहिए। लेकिन हालत यह है कि अपनी अर्थव्यवस्था के आकार पर इतराने वाले भारत की गिनती दुनिया के उन देशों में होती है जहां स्वास्थ्य के मद में जीडीपी के अनुपात में सरकारी व्यय सबसे कम होता है।

यहां प्राथमिक व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और जिला अस्पताल बदहाली के पर्याय हो गए हैं। निजी अस्पताल मुनाफाखोरी में किसी भी हद तक चले जाते हैं और वहां इलाज के नाम पर ठगी और लूट ज्यादा होती है। दवाएं लागत से बीसियों गुना कीमत पर मिलती हैं और नकली दवा बेचे जाने की शिकायतें भी आम हैं। यह तो बीमार पड़ जाने पर आने वाली मुश्किलें हुर्इं, भारत में सेहत को संकट में ले जाने वाले कई कारक हर जगह हमेशा मौजूद हैं। भारत दुनिया का सबसे प्रदूषित देश है, जहां हवा, पानी, मिट्टी, वनस्पति, फसल सब बीमारियों के वाहक बन गए हैं। कोई भी खाद्य पदार्थ मिलावट से बचा नहीं है। एक तरफ जन-स्वास्थ्य की समस्या बजट का पर्याप्त आबंटन न होने और संसाधनों के अभाव की है, और दूसरी तरफ स्वास्थ्य विरोधी-स्थितियां भी बढ़ती जा रही हैं। और भी दुखद यह है कि इन दोनों मोर्चों पर जूझने की कोई तैयारी नहीं दिखती।

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