ताज़ा खबर
 

संपादकीय: हक और नाहक

उत्तर प्रदेश में खास हुआ यह कि अखिलेश यादव की सरकार ने उ.प्र. मंत्रिगण (वेतन, भत्ते और विविध प्रावधान), कानून 1981 में संशोधन करके पूर्व मुख्यमंत्रियों को आजीवन सरकारी बंगला आबंटित किए जाने का नियम बना दिया था। याचिका इसी संशोधन के खिलाफ दायर की गई थी।

Author May 9, 2018 03:38 am
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है। (फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस)

सर्वोच्च अदालत ने पहले भी, नागरिकों का सशक्तीकरण करने वाले फैसले दिए हैं। सोमवार को आया उसका फैसला इसी सिलसिले की ताजा कड़ी है। एक स्वयंसेवी संस्था की तरफ से दायर जनहित याचिका पर फैसला सुनाते हुए अदालत ने कहा कि उत्तर प्रदेश में कोई भी पूर्व मुख्यमंत्री सरकारी बंगला पाने का हकदार नहीं है। अलबत्ता अदालत ने साथ में यह जरूर कहा है कि वह सुरक्षा और अन्य प्रोटोकॉल प्राप्त करने का हकदार होगा। यह फैसला सुनाते हुए अदालत ने जो तर्क दिए हैं वे दरअसल हमारे उन संवैधानिक मूल्यों और लोकतांत्रिक मर्यादाओं की ही याद दिलाते हैं जिन्हें विस्मृत या धुंधला करने की कोशिशें रोज होती हैं। अदालत ने दो टूक कहा है कि पद से हटने के बाद मुख्यमंत्री भी आम नागरिक की तरह हो जाते हैं। उनका पद पर रहना इतिहास का मामला हो जाता है और इसलिए यह विशेष सुविधाओं के लाभ का हकदार बनाने के लिए विशेष व्यक्तियों की श्रेणी बनाने और उसमें शामिल करने का उचित आधार नहीं हो सकता। यह अमूमन देखा गया है कि पद से निवृत्त हो जाने पर भी अनेक राजनीतिक सरकारी-आवास पर काबिज रहते हैं। बार-बार गुजारिश किए जाने पर भी आवास खाली नहीं करते। नोटिसों को धता बताते रहते हैं। शायद कुछ बरस सत्ता में रहने पर उनकी यह मनोवृत्ति बन जाती होगी कि वे नियम-कायदों से ऊपर हैं, या कोई उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकता। सरकारी बंगलों पर काबिज रहने की यह फितरत उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है। राजस्थान, मध्यप्रदेश समेत कई और राज्यों में भी सरकारी बंगलों पर पूर्व मुख्यमंत्रियों के काबिज रहने के तमाम उदाहरण मिल जाएंगे।

उत्तर प्रदेश में खास हुआ यह कि अखिलेश यादव की सरकार ने उ.प्र. मंत्रिगण (वेतन, भत्ते और विविध प्रावधान), कानून 1981 में संशोधन करके पूर्व मुख्यमंत्रियों को आजीवन सरकारी बंगला आबंटित किए जाने का नियम बना दिया था। याचिका इसी संशोधन के खिलाफ दायर की गई थी। यों इस मसले पर सर्वोच्च अदालत का रुख अगस्त 2016 में ही सामने आ गया था, जब उसने अपने एक फैसले में कहा था कि उत्तर प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी बंगले आबंटित करने की परंपरा कानून की दृष्टि से गलत है और उन्हें दो महीने के भीतर इन बंगलों को खाली कर देना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा था कि राज्य सरकार को इन बंगलों में अनधिकृत कब्जा करके रहने वालों से इस अवधि के लिए उचित किराया वसूल करना चाहिए। और अब अदालत ने उस कानून या कानून में किए गए उस संशोधन को ही निरस्त कर दिया है जो एक बेजा सहूलियत को जबर्दस्ती एक अधिकार की शक्ल देता था। यह सत्ता ही नहीं, विधायी शक्तियों के भी दुरुपयोग का मामला था।

विधायी शक्तियों के दुरुपयोग का ही मामला यह भी है कि सांसद और विधायक अपने वेतन-भत्ते, जब चाहे तब और जितना चाहें उतना बढ़वा लेते हैं। संबंधित प्रस्ताव संसद या विधानसभा में लगभग सर्वसम्मति से पारित हो जाते हैं। जबकि होना यह चाहिए कि कोई स्वतंत्र समिति या आयोग इस बारे में निर्णय करे। जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपने ताजा फैसले में कहा है, प्राकृतिक संसाधन, सार्वजनिक भूमि और सरकारी बंगले, सरकारी आवास जैसी सार्वजनिक संपत्ति देश की जनता की है। लेकिन सार्वजनिक संपत्ति के दुरुपयोग, उन पर अतिक्रमण और अवैध कब्जे का दायरा बहुत बड़ा है; किसी मुख्यमंत्री का पद से हटने के बाद भी सरकारी बंगले में रहना इसका एक सिरा भर है। सार्वजनिक संपत्ति के बारे में सर्वोच्च अदालत की टिप्पणी का दूरगामी और व्यापक अर्थ है, और उसे इसी रूप में लिया जाना चाहिए।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App