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संपादकीय: गंगा के लिए

गंगा की सफाई के लिए पिछले तीन दशक से लंबे-चौड़े अभियान चलते रहे हैं। हजारों करोड़ रुपए फूंके जा चुके हैं, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला। आज से चार साल पहले ‘नमामि गंगे’ नाम से एकीकृत गंगा संरक्षण मिशन परियोजना शुरू की गई थी। इसके लिए केंद्रीय बजट में 2037 करोड़ रुपए रखे गए थे।

Author July 19, 2018 1:42 AM
संत स्वामी सानंद आइआइटी-कानपुर में पर्यावरण अभियांत्रिकी के प्रोफेसर रहे हैं।

इन दिनों एक संत स्वामी सानंद गंगा को बचाने के लिए आमरण अनशन पर हैं। हालांकि उनका यह पहला अनशन नहीं है। वे पहले भी कई बार गंगा के संकट के मसले पर सरकार को ऐसी कई परियोजनाओं से हटने पर मजबूर कर चुके हैं, जो इस नदी के लिए घातक साबित होतीं। स्वामी सानंद लंबे समय से गंगा संरक्षण के लिए अलग कानून बनाने की मांग कर रहे हैं। उन्होंने इसका मसविदा भी तैयार किया था। लेकिन इस दिशा में अब तक प्रगति सिर्फ इतनी हो पाई कि केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय ने प्रस्तावित गंगा अधिनियम का प्रारूप तैयार करने के लिए एक समिति बना दी थी। लेकिन कानून अब तक नहीं बन पाया। इस बार स्वामी सानंद का आमरण अनशन इसी मांग को लेकर है। स्वामी सानंद खुद एक पर्यावरणविद और इंजीनियर रहे हैं। डेढ़ दशक से ज्यादा समय तक वे आइआइटी-कानपुर में पर्यावरण अभियांत्रिकी के प्रोफेसर रहे। गंगा के लिए उन्होंने अब तक जो कुछ किया है, वह इस नदी के प्रति उनके समर्पण की मिसाल है।

गंगा की सफाई के लिए पिछले तीन दशक से लंबे-चौड़े अभियान चलते रहे हैं। हजारों करोड़ रुपए फूंके जा चुके हैं, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला। आज से चार साल पहले ‘नमामि गंगे’ नाम से एकीकृत गंगा संरक्षण मिशन परियोजना शुरू की गई थी। इसके लिए केंद्रीय बजट में 2037 करोड़ रुपए रखे गए थे। इसके बाद केंद्र ने सात जुलाई, 2016 को नमामि गंगे परियोजना को मंजूरी दी और गंगा नदी को संरक्षित और स्वच्छ करने के काम पर अगले पांच साल में बीस हजार करोड़ रुपए खर्च करने की बात कही। लेकिन अफसोस की बात है कि जिस रफ्तार के साथ यह काम शुरू होना था, वह नहीं हो पाया। पिछले साल भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि स्वच्छ गंगा मिशन के लिए आबंटित किए गए 2600 करोड़ रुपए से अधिक का सरकार उपयोग ही नहीं कर सकी। यह वह पैसा था जो 31 मार्च 2017 तक खर्च होना था। जाहिर है, काम शुरू ही नहीं हुआ, और जो हुआ भी वह इतनी मंथर गति से कि उसके नतीजे नहीं के बराबर सामने आए। यह हमारे सरकारी तंत्र की कार्य-संस्कृति का एक उदाहरण है।

लेकिन सवाल है कि क्या गंगा सिर्फ कानून या अलग महकमा बना देने भर से बच जाएगी! इसके लिए जो इच्छाशक्ति और कार्य-संस्कृति सरकारों में दिखनी चाहिए, वह नजर नहीं आती। वरना ऐसा क्यों होता कि पैसा होने के बाद भी युद्धस्तर पर काम शुरू नहीं हो पाया। गंगा में खनन गतिविधियों को रोक पाने में सरकारें नाकाम रही हैं। गंगा के प्रवाह को बनाए रखना है तो उस पर बिजली परियोजनाएं लगाना बंद करना होगा। ऐसा माना जा रहा है कि उत्तराखंड सरकार की रुचि गंगा को बचाने में कम, उसे बचाने की मांग करने वालों का उत्पीड़न करने में ज्यादा है। स्वामी सानंद ने अलग से गंगा प्रबंधन तंत्र की बनाने का सुझाव दिया है, जिसमें स्थानीय प्रशासन और सिंचाई विभाग का कोई दखल न हो। यह सुझाव इसलिए व्यावहारिक लगता है कि ज्यादा प्रशासनिक अड़चनें लक्ष्य को अंजाम तक पहुंचाने में बाधा खड़ी करती हैं। नैनीताल हाईकोर्ट अपने एक महत्त्वपूर्ण फैसले में कह भी चुका है कि गंगा और यमुना को अब जीवित प्राणी माना जाएगा और उनको कोई नुकसान पहुंचाया गया तो भारतीय दंड संहिता के तहत मुकदमा चलेगा। अगर हम समय रहते गंगा को नहीं बचा पाए तो इसके गंभीर नतीजे होंगे।

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