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संपादकीय: खुदकुशी की कड़ियां

हिमांशु रॉय अपनी बहादुरी और काबिलियत के लिए जाने जाते थे। मुंबई के सेंट जेवियर कॉलेज से पढ़े रॉय 1988 बैच के आईपीएस थे।

Author May 12, 2018 4:34 AM
महाराष्ट्र के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक हिमांशु रॉय ने शुक्रवार को मुंबई स्थित अपने आवास पर स्वयं को गोली मार कर खुदकुशी कर ली।

महाराष्ट्र के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक हिमांशु रॉय की जिंदगी का जिस तरह से अंत हुआ वह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने शुक्रवार को मुंबई स्थित अपने आवास पर स्वयं को गोली मार कर खुदकुशी कर ली। वे काफी समय से ब्लड कैंसर से पीड़ित थे और तेईस नवंबर 2016 से चिकित्सावकाश पर थे। और मोटा अनुमान यही है कि कैंसर से जूझते-जूझते आखिर तंग आकर उन्होंने खुद को खत्म कर देने का फैसला किया होगा। रॉय की मौत जहां हमारे आंतरिक सुरक्षा बल की एक बड़ी क्षति है, वहीं यह अवसाद समेत आत्महत्या के उन कारणों की तरफ भी इशारा करती है, जो हमारे समाज में बढ़ते ही जा रहे हैं। हिमांशु रॉय अपनी बहादुरी और काबिलियत के लिए जाने जाते थे। मुंबई के सेंट जेवियर कॉलेज से पढ़े रॉय 1988 बैच के आईपीएस थे और उन्होंने मुंबई के संयुक्त पुलिस आयुक्त और महाराष्ट्र के आतंकवाद निरोधक दस्ते के प्रमुख समेत कई अहम जिम्मेदारियों का बड़ी कुशलता से निर्वाह किया। पत्रकार जे डे की हत्या और दस साल पहले मुंबई में हुए आतंकी हमले की योजना में शामिल रहे लश्कर-ए-तैयबा के डेविड हेडली के सुराग खोजने जैसे कई जटिल और चर्चित मामलों को सुलझाने का श्रेय उन्हें दिया जाता है। लेकिन जीवन कितना विडंबनाओं से भरा हुआ है कि बेहद खतरनाक अपराधियों से हमेशा बहादुरी से लोहा लेने वाले पुलिस अफसर ने एक दिन बीमारी से हार मान ली।

चिकित्सा विज्ञान की तमाम प्रगति के बावजूद कैंसर घोर पीड़ादायक और बेहद डराने वाला रोग बना हुआ है। एकदम प्रारंभिक अवस्था में निदान हो जाने और फौरन उपयुक्त चिकित्सा शुरू हो जाने पर बच जाने की उम्मीद रहती है। बाद के चरणों में पता चलने पर इलाज भी कठिन हो जाता है और बचने की उम्मीद भी बहुत कम रहती है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार में किसी को कैंसर हो जाए, तो यह उसकी जिंदगी के खतरे में पड़ जाने के साथ ही उसपरिवार को आर्थिक रूप से तोड़ देने वाला होता है। और अगर वह व्यक्ति परिवार का कमाऊ सदस्य हुआ, तब तो कैंसर कहर ही साबित होता है। हमारे देश में चिकित्सा-व्यय कर्जग्रस्तता का एक प्रमुख कारण है। बीमारी के अलावा और दूसरी वजहों से भी हमारे समाज में अवसाद बढ़ रहा है, जो कइयों को खुदकुशी की तरफ ले जाता है। परीक्षा परिणाम आने पर जाने कितने बच्चे तनाव या अवसाद के शिकार हो जाते हैं, कई के खुदकुशी करने की खबर भी आती है। बेरोजगारी और आर्थिक असुरक्षा भी हमारे समाज में चिंता, तनाव, हताशा और अवसाद की एक बड़ी वजह हैं। किसानों की खुदकुशी की घटनाओं के मूल में भी आर्थिक असुरक्षा ही है, क्योंकि उन्हें उनकी उपज का पुसाने लायक दाम नहीं मिल पाता है और वे बराबर कर्ज से दबे रहते हैं।

इस तरह हम देखते हैं कि भले आए दिन जीडीपी की वृद्धि दर का हवाला दे-देकर तेजी से विकास का दावा किया जाए, हमारे समाज की हालत ऐसी है जो इस दावे पर सवालिया निशान लगाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की तरफ से जारी ‘अवसाद एवं अन्य सामान्य मानसिक विकार-वैश्विक स्वास्थ्य आकलन’ शीर्षक रिपोर्ट बताती है कि दुनिया में अवसाद से ग्रस्त लोगों की संख्या तेजी से बढ़ रही हैं और ऐसे पचास फीसद लोग केवल दो देशों में हैं, चीन और भारत में। जबकि ये दोनों देश अपनी विकास दर पर इतराते रहते हैं। अच्छा हो कि विकास दर के बजाय स्वास्थ्य, सौहार्द और प्रसन्नता को तरक्की को मापने का पैमाना माना जाए। यों इस पैमाने पर दुनिया के विभिन्न देशों का आकलन शुरू भी हो चुका है, पर यह अभी छिटपुट तौर पर है, जबकि इस पैमाने को व्यापक रूप से लागू करने की जरूरत है।

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