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संपादकीय: दुरुस्त आयद

भीड़ की हिंसा को हम उन्मादी कृत्य कह सकते हैं, मगर यह देखें कि इस तरह की हिंसा के सर्वाधिक शिकार कौन लोग हुए हैं तो हमें ज्यादातर मामलों में सुनियोजित रूप से नफरत फैलाने का अभियान नजर आएगा। लिहाजा, इस पर रोक लगाने की ज्यादा जिम्मेवारी सरकार की है। वॉट्सऐप पर गुस्सा निकालने से कोई खास फायदा नहीं होगा।

Author July 7, 2018 3:14 AM
इस तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है।

गुरुवार को केंद्र सरकार ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को भीड़ द्वारा पीट-पीट कर मार डालने की घटनाओं को रोकने के लिए कहा। देर से ही सही, यह दुरुस्त कदम है। राज्यों को भेजे गए परामर्श में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सोशल मीडिया पर फैली अफवाहों के कारण या अफवाहों के जरिए भीड़ को हिंसा के लिए उकसाने की घटनाओं को रोकने की खातिर कई उपाय सुझाए हैं जिन्हें लागू करने के लिए जिला प्रशासन को निर्देश देने को कहा है। ऐसी घटनाओं के ही मद्देनजर बीते मंगलवार को सरकार ने वॉट्सऐप को नोटिस जारी किया था। जवाब में वाट्सऐप ने भरोसा दिलाया है कि वह कुछ ऐसे तकनीकी उपाय करने जा रहा है जो फर्जी सूचनाओं की पहचान करने में मददगार साबित होंगे। यह सारी कवायद इसलिए करनी पड़ रही है कि भीड़ की हिंसा की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। ऐसी घटनाएं असम से लेकर तमिलनाडु तक अनेक राज्यों में हुई हैं और इनमें पिछले एक साल में सत्ताईस लोग मारे गए हैं। इस तरह का स्तब्ध कर देने वाला एक वाकया पिछले दिनों महाराष्ट्र के धुले जिले में हुआ जिसमें भीड़ ने बच्चा चुराने के शक में पांच लोगों की पीट-पीट कर हत्या कर दी।

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कहीं पर अजनबी मात्र होना, कोई अनजान रास्ता पकड़ लेना, किसी से रास्ता पूछ बैठना, किसी बच्चे को टॉफी की पेशकश आदि कुछ भी भीड़ के हाथों पीटे जाने का सबब हो सकता है। क्या हमारे समाज में ‘दूसरे’ पर अविश्वास इतना बढ़ गया है कि सच्चाई जानने का धीरज नहीं रहता, या उसकी जरूरत महसूस नहीं की जाती? क्या लोगों का कानून-व्यवस्था और अदालत पर भरोसा इस हद तक कमजोर हो चुका है कि कौन दोषी है और कौन निर्दोष, और किसका दोष क्या है इस झंझट में लोग नहीं पड़ना चाहते, और वे जिसे आरोपी समझते हैं उसे पुलिस के हवाले करने के बजाय खुद फौरन ‘सजा’ देने में उन्हें कुछ भी गलत नहीं लगता? या, हिंसक भीड़ में शामिल लोगों में यह ‘आत्मविश्वास’ काम कर रहा होता है कि वे सबके सामने, दिनदहाड़े हत्या कर दें, तो भी उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा? ये सवाल इसलिए उठते हैं कि कई मामलों में पुलिस मूकदर्शक या निष्क्रिय बनी रही। गोरक्षा के नाम पर हुई भीड़ की हिंसा के कई मामलों में तो उलटे पीड़ितों के खिलाफ ही मामले दर्ज किए गए। तीन साल पहले जब उत्तर प्रदेश के दादरी में मोहम्मद अखलाक की हत्या हुई तभी हमारे राज्यतंत्र को चेत जाना चाहिए था। लेकिन सियासी वजहों से उस घटना में छिपी चेतावनी अनसुनी कर दी गई।

भीड़ की हिंसा को हम उन्मादी कृत्य कह सकते हैं, मगर यह देखें कि इस तरह की हिंसा के सर्वाधिक शिकार कौन लोग हुए हैं तो हमें ज्यादातर मामलों में सुनियोजित रूप से नफरत फैलाने का अभियान नजर आएगा। लिहाजा, इस पर रोक लगाने की ज्यादा जिम्मेवारी सरकार की है। वॉट्सऐप पर गुस्सा निकालने से कोई खास फायदा नहीं होगा। हमारे राजनीतिक कभी भी भीड़ की हिंसा के खिलाफ डट कर खड़े नहीं होते, उन्हें भीड़ में ही जनमत नजर आता है, भले वह उन्मादी भीड़ ही क्यों न हो। नतीजा यह है कि राजनीतिक हिंसा की घटनाओं से लेकर बच्चा-चोरी के शक में होने वाली घटनाओं तक, उन्माद का दायरा फैलता जा रहा है। ऐसी घटनाएं कानून-व्यवस्था की सामान्य समस्या नहीं हैं। ये सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर आ रही कुछ बेहद खतरनाक विकृतियों की देन हैं। ऐसी घटनाएं न हों, इसके लिए कानून-व्यवस्था की मुस्तैदी के अलावा उन विकृतियों को मिटाने का संकल्प भी जरूरी है।

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