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संपादकीय: मनमानी की दवा

केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने औषधि सलाहकार बोर्ड की सिफारिशों को मंजूरी देते हुए कहा है कि मरीजों के स्वास्थ्य से बड़ा नुकसान और कुछ नहीं हो सकता; ये दवाएं मरीजों की सेहत को लेकर तय मानकों पर खरी साबित नहीं उतरती हैं।

Author September 14, 2018 5:01 AM
सांकेतिक तस्‍वीर

इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि जो दवा सेहत को नुकसान पहुंचा सकती है, लोगों को किसी बीमारी की हालत में न केवल उसका सेवन करना पड़ता है, बल्कि खुद डॉक्टर भी वे दवाएं लेने की सलाह देते हैं। सही है कि इन दवाओं के दुष्परिणाम के बारे में जानकारी आम नहीं होती, इसलिए साधारण लोगों को पता नहीं चल पाता कि किस दवा को खाने से कोई बीमारी ठीक हो जाएगी, लेकिन स्वास्थ्य पर उसके दूसरे असर भी हो सकते हैं। आमतौर पर प्रशिक्षित डॉक्टर भी ऐसी दवा लेने की सलाह दे देते हैं, जो मरीज की स्थिति में तात्कालिक सुधार तो करती हैं, लेकिन शरीर में किसी दूसरी परेशानी की वजह बन सकती हैं। दवा कंपनियों से लेकर डॉक्टरों तक की लापरवाही या मिलीभगत की वजह से यह धंधा निर्बाध गति से चल रहा है। इस लिहाज से देखें तो सरकार ने जिस तरह तीन सौ अट्ठाईस दवाओं के उत्पादन और बिक्री पर प्रतिबंध की घोषणा की है, वह आम नागरिकों की सेहत का खयाल रखने के लिहाज से जरूरी कदम है। इनमें कई ऐसी दवाएं हैं, जिनका उपयोग आम है और कई बार छोटी-मोटी मौसमी बीमारियों की चपेट में आने के बाद लोग चिकित्सक के परामर्श के बिना भी दवा की दुकानों से लेकर खा लेते हैं।

केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने औषधि सलाहकार बोर्ड की सिफारिशों को मंजूरी देते हुए कहा है कि मरीजों के स्वास्थ्य से बड़ा नुकसान और कुछ नहीं हो सकता; ये दवाएं मरीजों की सेहत को लेकर तय मानकों पर खरी साबित नहीं उतरती हैं। सवाल है कि जिन दवाओं पर रोक लगाई गई है, बाजार में उन्हें बिक्री के लिए उतारने से पहले क्या उनके दुष्परिणामों के लिहाज से परीक्षण किया गया था? अब तक अगर ये दवाएं खुले बाजार में बिक रही थीं, डॉक्टर उन्हें लेने की सलाह दे रहे थे और मरीज उनका सेवन कर रहे थे तो उनका असर लोगों पर क्या हुआ होगा? यह एक अफसोसजनक स्थिति है कि अब तक इन दवाओं का उपयोग करने वाले मरीज अपनी बीमारी का इलाज कराते हुए एक तरह से अघोषित रूप से क्लिनिकल ट्रायल यानी दवा-परीक्षण का जरिया बन गए। अगर दवाओं के दुष्परिणामों के मद्देनजर किसी व्यक्ति की सेहत पर कोई दीर्घकालिक असर पड़ा होगा, तो उनसे होने वाले नुकसान की जवाबदेही किस पर होगी? ऐसी कई दवाइयां हैं, जो विदेशों में प्रतिबंधित हैं, लेकिन हमारे यहां वे धड़ल्ले से बिकती रही हैं और उनके सेवन की सलाह बाकायदा प्रशिक्षित डॉक्टर भी देते रहे हैं।

जाहिर है, इसके पीछे इस बात की निश्चिंतता काम करती होगी कि औषधि मानकीकरण से संबंधित महकमे के सख्त परीक्षण के दौर से गुजरने के बाद ही किसी दवा को बाजार में उतारा गया होगा। दूसरे, यह किसी से छिपा नहीं है कि दवा कंपनियां डॉक्टरों को किन-किन रास्तों से प्रभावित करने की कोशिश करती रही हैं। यही वजह है कि कई बार कुछ डॉक्टर किसी रोग के इलाज के लिए ऐसी दवाएं भी लेने की सलाह दे देते हैं, जिनकी कोई जरूरत नहीं होती। भारत में स्वास्थ्य के मसले पर इलाज से लेकर दवाओं के इस्तेमाल के बारे में इस तरह की लापरवाही के मामले आम रहे हैं। इसलिए जरूरत इस बात की है कि किसी भी दवा को बिक्री के लिए बाजार में उतारने से पहले ही उसके असर और दुष्परिणामों के बारे में ठोस अध्ययन कर लिया जाए।

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