jansatta Editorial artical acquisition of rocketing about Stone-throwing in Jammu and Kashmir - संपादकीय: पत्थरबाजी का हासिल - Jansatta
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संपादकीय: पत्थरबाजी का हासिल

जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने युवक की मौत को ‘मानवता की हत्या’ करार दिया और कहा कि जो लोग किसी को मारने के लिए पत्थर उठाते हैं, उनका कोई धर्म नहीं होता।

Author May 10, 2018 4:51 AM
फोटो का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (फाइल फोटो)

पिछले कुछ समय से जम्मू-कश्मीर में पत्थरबाजी मानो विरोध प्रदर्शन का पर्याय बन चुकी है। जिस रूप में यह जारी है, उसका कुछ हासिल नहीं। इसका खमियाजा वहां की आम जनता को उठाना पड़ता है। सोमवार को कश्मीर के बड़गाम जिले में पत्थरबाजी की चपेट में आकर तमिलनाडु के एक युवक की मौत हो गई। इससे एक बार फिर स्पष्ट हुआ है कि आंदोलन के नाम पर कुछ बेलगाम तत्त्वों का मकसद सिर्फ अराजकता फैलाना है और उन्हें इससे कोई मतलब नहीं है कि इसका कश्मीर की आम जनता के जीवन पर क्या असर पड़ता है या राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी कैसी छवि बनती है। गौरतलब है कि शोपियां में पांच चरमपंथियों और पांच आम नागरिकों की मौत के विरोध में अलगाववादियों ने घाटी में सोमवार को बंद की घोषणा की थी। इसी दौरान नरबल इलाके से एक वाहन में गुलमर्ग की ओर जा रहे तमिलनाडु के कुछ पर्यटकों पर लोगों ने पत्थर बरसाना शुरू कर दिया। इसमें तेईस साल के एक युवक की मौत हो गई और चार लोग घायल हो गए।

इस घटना के बाद आम लोगों से लेकर नेताओं तक ने एक सुर में पत्थरबाजी की सख्त आलोचना की है। खासकर जम्मू-कश्मीर की नुमाइंदगी करने वाले कुछ अहम नेताओं ने जिस तरह गंभीर चिंता जताई है, वह कम से कम भविष्य में कुछ बेहतरी की उम्मीद जगाती है। जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने युवक की मौत को ‘मानवता की हत्या’ करार दिया और कहा कि जो लोग किसी को मारने के लिए पत्थर उठाते हैं, उनका कोई धर्म नहीं होता। इसी तरह, पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी कहा कि पत्थरबाजों के तरीकों और विचारधारा पर मुझे गहरा अफसोस है; हमने एक पर्यटक, एक मेहमान की जान ले ली है। यों जम्मू-कश्मीर में पत्थरबाजी की घटना आम हो चुकी है। हालांकि अब तक यह टकराव आमतौर पर अलगाववादियों और सुरक्षा बलों के बीच होता रहा है। मगर ताजा घटना इसलिए ज्यादा चिंताजनक है कि इसमें पहली बार कश्मीर घूमने पहुंचे लोगों पर हमला किया गया। प्रतिरोध के नाम पर सिर्फ बेलगाम हिंसा का सहारा कैसे किसी लड़ाई को दिशाहीन बना देता है, यह जम्मू-कश्मीर में देखा जा सकता है।

सवाल है कि जो पत्थरबाज कश्मीरी अस्मिता का सवाल उठाने के दावे के साथ हिंसक गतिविधियों को अंजाम देते हैं, उन्होंने पर्यटकों पर हमला करने में राज्य या वहां की आम जनता का क्या हित देखा? यह सभी जानते हैं कि कश्मीर में एक लाख से ज्यादा लोगों की जीविका एक तरह से पर्यटन और उससे होने वाली आय पर टिकी है। किसी एक पर्यटक की इस तरह हत्या के बाद पर्यटकों के बीच वहां जाने को लेकर कैसी राय बन सकती है, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। तमिल युवक की मौत के बाद कश्मीर में मौजूद बाकी पर्यटकों ने भी अपना सामान समेटना शुरू कर दिया और वहां घूमने गए बहुत सारे लोगों ने डर की वजह से कश्मीर छोड़ दिया। इस हकीकत से अलगाववादी भी अनजान नहीं होंगे कि पहले ही मंदी से जूझते पर्यटन उद्योग से जुड़े स्थानीय लोगों के सामने कैसी लाचारगी के हालात पैदा हो सकते हैं और इसका जम्मू-कश्मीर की अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा। फिर आखिर किन वजहों से उन्होंने किसी पर्यटक वाहन पर हमला किया और उसमें एक युवक की जान जाने के बाद उनकी कथित लड़ाई को क्या हासिल हुआ?

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