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संपादकीय : पूरब की ओर

भारत और इंडोनेशिया के साझा दृष्टिपत्र में पूरे समुद्री क्षेत्र में नियम व कानून सम्मत व्यवस्था बनाने और सभी देशों को समान अवसर देने की बात कही गई है। दोनों देश चाहते हैं कि समुद्री क्षेत्र में आवाजाही के लिए संयुक्त राष्ट्र ने जो संहिता बना रखी है, उसका सभी देश पालन करें। यह चीन की दादागीरी की ओर इशारा है।

Author June 2, 2018 3:37 AM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (एक्सप्रेस फाइल फोटो)

प्रधानमंत्री की पूरब के तीन देशों- इंडोनेशिया, मलेशिया और सिंगापुर- की यात्रा कई मायनों में महत्त्वपूर्ण रही। कारोबारी और रणनीतिक रिश्तों के लिहाज से तीनों ही देश भारत के लिए काफी अहमियत रखते हैं। भारत और इंडोनेशिया लंबे समय से आतंकवाद से जूझ रहे हैं। ऐसे में इंडोनेशिया के साथ आतंकवाद के मसले पर वार्ता दोनों देशों के बीच दूरगामी रणनीति के संकेत देती है। प्रधानमंत्री और इंडोनेशिया के राष्ट्रपति के बीच द्विपक्षीय वार्ता के बाद जारी साझा बयान में आतंकवाद से निपटने को लेकर बड़े एलान हुए। दोनों नेताओं ने आतंकवाद के सभी स्वरूपों की कड़ी भर्त्सना की और इस पर सहमति जताई कि दोनों देशों के बीच सूचनाओं और खुफिया जानकारियों का आदान-प्रदान हो। व्यापार और पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए अंडमान-निकोबार द्वीप समूह और सुमात्रा द्वीप के प्रांतों के बीच संपर्क बनाने के लिए कार्यबल बनाने पर भी सहमति बनी। ‘एक्ट ईस्ट’ नीति की दिशा में भारत का यह बड़ा कदम है।

मलेशिया और सिंगापुर की यात्रा भी ऐसे ही महत्त्व वाली है। एक्ट ईस्ट नीति में भारत ने सबसे ज्यादा तरजीह मलेशिया को दी है। बानवे साल के महातिर मोहम्मद ने पिछले महीने की दस तारीख को फिर से देश की कमान संभाली है। भले प्रधानमंत्री कुछ घंटों के लिए ही मलेशिया रुके, लेकिन महातिर मोहम्मद से मिल कर उन्होंने यह संदेश दिया कि भारत के लिए मलेशिया बड़ा रणनीतिक साझीदार भी है। इसलिए भारत उसे हमेशा से महत्व देता रहा है। चीन से मिलने वाली चुनौतियां को देखते हुए भारत के लिए पूर्वी देशों में अपनी पैठ बढ़ाना जरूरी हो गया है। सिंगापुर यात्रा के दौरान भी प्रधानमंत्री ने रणनीतिक मुद््दों के अलावा व्यापार, निवेश, नवोन्मेष पर व्यापक चर्चा की। तीनों देशों के साथ रणनीतिक मुद््दे वार्ता के केंद्र में रहे। इसे भारत की एक्ट ईस्ट नीति का नतीजा ही माना जाना चाहिए कि इंडोनेशिया ने भारत के साथ समग्र रणनीतिक साझेदारी का एलान किया। भारत के अलावा ऐसी साझेदारी उसने सिर्फ चीन के साथ की है। हिंद-प्रशांत महासागर क्षेत्र में भारत ने भी ऐसा समझौता सिर्फ इंडोनेशिया से किया है। यह एक तरह से भारत और इंडोनेशिया के रिश्तों में बड़े बदलाव का संकेत है।

भारत और इंडोनेशिया के साझा दृष्टिपत्र में पूरे समुद्री क्षेत्र में नियम व कानून सम्मत व्यवस्था बनाने और सभी देशों को समान अवसर देने की बात कही गई है। दोनों देश चाहते हैं कि समुद्री क्षेत्र में आवाजाही के लिए संयुक्त राष्ट्र ने जो संहिता बना रखी है, उसका सभी देश पालन करें। यह चीन की दादागीरी की ओर इशारा है। दक्षिण चीन सागर में चीन ने जिस तरह से अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया है, वह न सिर्फ एशिया के देशों के लिए खुली चुनौती है, बल्कि अमेरिका तक उससे बेचैन है। पिछले साल भारत, जापान, आस्ट्रेलिया और अमेरिका के बीच पहली रणनीतिक वार्ता हुई थी। अब अक्तूबर में भारत, इंडोनेशिया और आस्ट्रेलिया पहली त्रिपक्षीय रणनीतिक वार्ता करेंगे। ‘पूरब की ओर देखने’ यानी दक्षिण पूर्व एशिया के देशों के साथ संबंध प्रगाढ़ करने की पहल मनमोहन सिंह सरकार ने की थी। पर तब जोर कारोबार पर ज्यादा था। रणनीतिक आयाम की जो कमी रह गई थी, अब उसे दूर करने की कोशिश हो रही है।

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