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संपादकीय: मिले सुर

ट्रंप और किम की शिखर वार्ता पूरी तरह परमाणु हथियारों के मसले पर ही केंद्रित रहेगी। अमेरिका पूरे कोरियाई क्षेत्र को परमाणु हथियार मुक्त क्षेत्र बनाने की जिद पर अड़ा है। लेकिन सवाल है कि अमेरिका उत्तर कोरिया को कहां तक झुका या मना पाता है।

Author May 12, 2018 04:37 am
उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच ठीक महीने भर बाद यानी बारह जून को सिंगापुर में मुलाकात होगी।

उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच ठीक महीने भर बाद यानी बारह जून को सिंगापुर में मुलाकात होगी। दोनों नेताओं की यह मुलाकात पूरी दुनिया के लिए राहत की बात है। पिछले दो साल के दौरान दोनों देशों के बीच तनाव जिस चरम स्थिति में पहुंच गया था, उससे लग रहा था कि तीसरा विश्वयुद्ध दूर नहीं है। दो साल के भीतर उत्तर कोरिया ने खुल कर अपने परमाणु और मिसाइल परीक्षण किए और एक एटमी ताकत संपन्न देश के रूप में दुनिया के सामने आया। उत्तर कोरिया ने जो मिसाइलें बना ली हैं, वे अमेरिका को खतरे में डालने की ताकत रखती हैं। अमेरिका को किम की यह खुली चुनौती थी। युद्ध की आशंका वाले ऐसे हालात बन गए थे कि उत्तर कोरिया से निपटने के लिए अमेरिका ने अपने जंगी जहाजों वाले बेड़े को रवाना कर दिया था। कोरिया के विभाजन के बाद से ही उत्तर कोरिया अमेरिका की आंख की किरकिरी रहा है, जबकि दक्षिण कोरिया अमेरिका के खेमे में। उत्तर कोरिया को चीन का प्रत्यक्ष नहीं तो परोक्ष समर्थन हासिल है। शीतयुद्ध के दौर के बाद यह पहला मौका है जब अमेरिकी राष्ट्रपति और उत्तर कोरिया के शासक के बीच शिखर वार्ता होने जा रही है।

ट्रंप और किम की शिखर वार्ता पूरी तरह परमाणु हथियारों के मसले पर ही केंद्रित रहेगी। अमेरिका पूरे कोरियाई क्षेत्र को परमाणु हथियार मुक्त क्षेत्र बनाने की जिद पर अड़ा है। लेकिन सवाल है कि अमेरिका उत्तर कोरिया को कहां तक झुका या मना पाता है। उत्तर कोरिया जितनी एटमी ताकत हासिल कर चुका है, वह मामूली नहीं है। ऐसे में वार्ता कहां तक सफल होगी, कोई नहीं जानता। अमेरिका ने चेतावनी भी दी है कि अगर वार्ता से पहले उत्तर कोरिया ने कोई उकसावे वाली हरकत की तो यह मुलाकात खटाई में पड़ सकती है। इससे लगता है वार्ता तो होने जा रही है, पर विश्वास का पुल अब भी नहीं बन पाया है। हालांकि वार्ता से पहले उत्तर कोरिया ने कोरियाई मूल के तीन अमेरिकी नागरिकों की रिहा कर दिया। यह अमेरिका की पहली उपलब्धि है और इसे किम की ओर से शांति वार्ता के प्रति सकारात्मक रुख के तौर पर देखा जाना चाहिए।

पिछले एक महीने का घटनाक्रम इस बात का प्रमाण है कि उत्तर कोरिया ने भी शांति की दिशा में कदम तो बढ़ाए हैं। यह बात अलग है कि ऐसा उसने चारों ओर से बढ़ते दबाव में किया। किम जोंग अप्रैल में दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति से मिले थे और फिर इस महीने चीनी राष्ट्रपति से मिले। कोरिया के विभाजन के बाद दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति से उत्तर कोरिया के राष्ट्रपति की मुलाकात दूरगामी संदेश वाली थी। इससे यह संकेत भी मिला कि दोनों कोरिया कभी भी एक होने की संभावनाएं टटोल सकते हैं। ट्रंप से मुलाकात के पहले किम का चीनी राष्ट्रपति से मिलना भी गहरे अर्थ लिए हुए है। किम जोंग अमेरिकी कूटनीति से निपटने के लिए कोई भी मौका नहीं छोड़ेंगे, यह अमेरिका भी जानता है। ऐसे में शांति की यह पहल कितनी कामयाब हो पाएगी, यह वक्त ही बताएगा।

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