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असुरक्षित अदालतें

बिहार में आरा के जिला न्यायालय परिसर में हुआ बम विस्फोट भले कोई आतंकवादी हमला न हो, पर ऐसी घटनाएं बताती हैं कि सुरक्षा-व्यवस्था के मामले में मामूली लापरवाही के कितने भयावह नतीजे हो सकते हैं। इस विस्फोट में दो लोगों की मौत हो गई और सत्रह गंभीर रूप से घायल हो गए। कयास है […]

Author January 26, 2015 10:30 PM

बिहार में आरा के जिला न्यायालय परिसर में हुआ बम विस्फोट भले कोई आतंकवादी हमला न हो, पर ऐसी घटनाएं बताती हैं कि सुरक्षा-व्यवस्था के मामले में मामूली लापरवाही के कितने भयावह नतीजे हो सकते हैं। इस विस्फोट में दो लोगों की मौत हो गई और सत्रह गंभीर रूप से घायल हो गए। कयास है कि यह एक कुख्यात अपराधी को फरार होने में मदद के लिए रची गई घटना थी। बम संभवत: एक महिला के पास उसके थैले में था और अदालत में कैदियों की पेशी के लिए परिसर में लाने के ठीक पहले फट गया। हालांकि प्रशासन ने उस महिला के आत्मघाती होने की बात से इनकार किया है, लेकिन उस शक्तिशाली बम विस्फोट में एक पुलिसकर्मी के साथ जिस तरह वह महिला भी मारी गई, उससे इस आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। अगर ऐसा साबित हुआ तो यह गंभीर चिंता की बात है कि क्या आतंकवादियों के हमले के एक हथियार के रूप में देखे जाने वाले आत्मघाती बम विस्फोट के तरीके का इस घटना में भी इस्तेमाल किया गया! गौरतलब है कि विस्फोट के बाद मची अफरा-तफरी के बीच हत्या, डकैती और फिरौती जैसे गंभीर मामलों में गिरफ्तार दो अपराधी फरार हो गए। उनमें से एक 2009 में इसी अदालत परिसर में बम विस्फोट का आरोपी है। यानी जो अपराधी जैसी घटना को अंजाम देने के आरोप में गिरफ्तार था, उसे फरार कराने के लिए वैसी ही योजना बनाई गई। अगर एक खतरनाक अपराधी फरार होने में कामयाब हुआ तो क्या इसमें कुछ ऐसे लोगों ने उसे अपने बाहर के साथियों से संपर्क करने में मदद पहुंचाई, जिन्हें पेशी के लिए लाए जाने की पूरी सूचना थी? जाहिर है, यह गंभीर जांच का विषय है और इसे सामान्य आपराधिक घटना मान कर इसकी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए।

अदालत परिसरों में पेशी के वक्त किसी अपराधी को छुड़ाने के लिए उसके साथियों के हमले की घटनाओं को लेकर अक्सर चिंता जताई जाती रही है। लेकिन अब तक अदालत या आसपास की जगहों को पूरी तरह ऐसी घटनाओं से सुरक्षित नहीं बनाया जा सका है। 2009 में आरा की दीवानी अदालत में हुए धमाके के विरोध में पटना उच्च न्यायालय के करीब दस हजार से ज्यादा वकील अपनी सुरक्षा के प्रति चिंता जाहिर करते हुए हड़ताल पर चले गए थे। मगर उसके बाद भी ऐसी घटनाएं न हों, इसे सुनिश्चित करना सरकार को जरूरी नहीं लगा। बिहार में पिछले पांच साल में अदालतों में बम विस्फोट की यह तीसरी घटना है। राज्य की विभिन्न अदालतों में पर्याप्त सुरक्षा-व्यवस्था न होने के चलते कई वकीलों के मारे जाने की घटनाएं भी सामने आ चुकी हैं। यह छिपा नहीं है कि जिला मुख्यालयों में स्थित स्थानीय अदालतों में आए दिन आपराधिक मामलों में पेशी के लिए गवाहों के अलावा अभियुक्तों को पेशी के लिए लाया जाता है। उनमें कई खतरनाक अपराधी भी होते हैं, जिन्हें छुड़ाने के लिए उनके साथी मौके की ताक में रहते हैं। जाहिर है, अदालत परिसर में केवल वकीलों या दूसरे लोगों की सुरक्षा के लिहाज से नहीं, बल्कि अपराधियों के फरार होने के क्रम में होने वाले उनके गिरोहों के हमलों की आशंका के मद्देनजर भी चाक-चौबंद व्यवस्था की जरूरत है। इसलिए भी कि अगर खुद अदालत परिसरों में जोखिम के ऐसे हालात बने रहेंगे तो दूसरी जगहों पर सुरक्षा-व्यवस्था की क्या उम्मीद की जा सकती है!

 

 

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