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संपादकीय: भ्रष्टाचार के विरुद्ध

भ्रष्टाचार निरोधक कानून करीब तीन दशक पुराना है। इसमें संशोधन की कवायद पांच साल पहले यानी 2013 में हुई थी। इस विधेयक को पहले संसदीय समिति के पास विचार के लिए भेजा गया था। उसके बाद विधि विशेषज्ञों की समिति और फिर 2015 में चयन समिति के पास भेजा गया। इस समिति ने 2016 में रिपोर्ट दी।

Author July 21, 2018 1:32 AM
गुरुवार को राज्यसभा ने भ्रष्टाचार निरोधक कानून में संशोधन वाले विधेयक को मंजूरी दे दी।

आर्थिक अपराधों को अंजाम देकर विदेश भाग जाने के कई मामले सुर्खियों में आने के बाद ऐसे लोगों से निपटने के लिए कानून बनाने की कवायद तेज हो गई है। गुरुवार को राज्यसभा ने भ्रष्टाचार निरोधक कानून में संशोधन वाले विधेयक को मंजूरी दे दी। जबकि लोकसभा ने भगोड़ा आर्थिक अपराधी विधेयक, 2018 को ध्वनिमत से पारित कर दिया। हालांकि अभी इन दोनों विधेयकों को कानून की शक्ल लेने के लिए लंबी प्रक्रिया से गुजरना है, लेकिन उम्मीद की जानी चाहिए कि यह काम तेजी से होगा और आर्थिक अपराध करने वालों पर नकेल कसी जा सकेगी। पिछले दो दशकों में देश में भ्रष्टाचार और आर्थिक अपराधों का ग्राफ जिस तेजी से बढ़ा है, वह काफी गंभीर है। इससे अर्थव्यवस्था को भी भारी नुकसान पहुंचता है। इतना ही नहीं, बढ़ता भ्रष्टाचार व्यवस्था पर से आमजन के विश्वास को भी कम करता है। हालांकि घूसखोरी जैसे मामलों से निपटने के लिए कानून पहले से मौजूद थे, लेकिन ये कमजोर साबित हो रहे थे। जहां तक सवाल है आर्थिक अपराध करके भाग निकलने वालों का, तो ऐसे मामलों से निपटने के लिए पर्याप्त कानूनों की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी।

यों भ्रष्टाचार निरोधक कानून करीब तीन दशक पुराना है। इसमें संशोधन की कवायद पांच साल पहले यानी 2013 में हुई थी। इस विधेयक को पहले संसदीय समिति के पास विचार के लिए भेजा गया था। उसके बाद विधि विशेषज्ञों की समिति और फिर 2015 में चयन समिति के पास भेजा गया। इस समिति ने 2016 में रिपोर्ट दी। पिछले साल इसे संसद में लाया में गया। इतने लंबे वक्त के बाद इस बार राज्यसभा से इसे हरी झंडी मिली है। अब इसे मंजूरी के लिए लोकसभा को भेजा जाएगा। पुराना कानून भ्रष्टाचार, घूसखोरी जैसे अपराधों से निपटने में कमजोर साबित हो रहा था। इसीलिए इसमें अब संशोधन करके इसे सख्त बनाने के प्रयास किए गए हैं। नए बिल में घूसखोरी को लेकर कड़े प्रावधान किए गए हैं। इसमें एक मुख्य बात यह है कि अब तक घूस लेने वाले तो लपेटे में आ जाते थे, लेकिन घूस देने वालों का कुछ नहीं बिगड़ता था। लेकिन इस संशोधन विधेयक में अब घूस देने वाले को भी सजा का प्रावधान किया गया है। अगर कानून बन गया तो घूस देने वाले को भी कम से कम तीन साल और अधिकतम सात साल की सजा होगी। अगर घूस देने वाला किसी व्यक्ति किसी व्यावसायिक संस्थान से जुड़ा है तो वह भी जांच के दायरे में आएगा और ऐसे में विशेष अदालत के जज दो साल के भीतर ऐसे मामलों की सुनवाई सुनिश्चित करेंगे। लेकिन इस संशोधन विधेयक में कुछ प्रावधान ऐसे हैं जिनसे घूसखोर सरकारी अफसरों पर हाथ डालना जांच एजेंसियों के लिए आसान नहीं होगा। सीबीआइ या अन्य जांच एजेंसियां किसी भी अधिकारी के खिलाफ संबंधित प्राधिकारी की इजाजत के बिना मामला दर्ज नहीं कर सकेंगी। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इस कानून में संशोधन घूस देने वालों पर शिकंजा कसने के लिए ही किया गया है! इसीलिए इसके दुरुपयोग की आशंकाएं खड़ी हुई हैं। सरकार और कानून प्रवर्तन एजेंसियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि ऐसे कानून का इस्तेमाल भ्रष्टाचार से निपटने में हो, न कि यह उत्पीड़न का हथियार बन जाए।

दूसरा कानून भगोड़े आर्थिक अपराधियों को लेकर है। विजय माल्या, नीरव मोदी, मेहुल चौकसी जैसे बड़े आर्थिक घोटालेबाजों के विदेश भाग जाने के बाद इनको भारत वापस लाने में सरकार को अब तक कोई कामयाबी हासिल नहीं हुई है। माल्या पर बैंकों का नौ हजार करोड़ रुपए से ज्यादा बाकी है। जबकि नीरव मोदी और मेहुल चौकसी पंजाब नेशनल बैंक का तेरह हजार करोड़ रुपए से ज्यादा पैसा लेकर भागे हैं। ऐसे अपराधियों से निपटने में सरकारी तंत्र लाचार साबित हुआ है। इन अपराधियों को वापस लाना बड़ी चुनौती है। इसलिए सरकार ने भगोड़े आर्थिक अपराधी विधेयक- 2018 को संसद में पेश कर कानून बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया है। इस विधेयक में ऐसे अपराधियों को भारत की कानूनी प्रक्रिया से बचने से रोकने, उनकी संपत्ति जब्त करने और उन्हें दंडित करने के प्रावधान किए गए हैं। इसमें ऐसे सभी भगोड़े आर्थिक अपराधी शामिल होंगे जो सौ करोड़ रुपए से ज्यादा का घोटाला कर भाग निकले हैं। ऐसे घोटाले और घूसखोरी जैसे अपराधों का इतिहास पुराना है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि ऐसे अपराधियों से निपटने के लिए जो कानून बहुत पहले होने चाहिए थे, उन्हें बनाने की दिशा में अब बढ़ा गया है।

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