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बीमारी की हवा

वायु प्रदूषण से स्वास्थ्य को बढ़ते खतरे को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पहले भी कई बार चेताया है। पर अब उसकी चेतावनी और सख्त है। उसके ताजा अध्ययन के मुताबिक इसमें कोई संदेह नहीं रह गया है कि दुनिया भर में स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाले पर्यावरणीय कारकों में वायु प्रदूषण पहले नंबर पर […]

Author June 3, 2015 5:53 PM

वायु प्रदूषण से स्वास्थ्य को बढ़ते खतरे को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पहले भी कई बार चेताया है। पर अब उसकी चेतावनी और सख्त है। उसके ताजा अध्ययन के मुताबिक इसमें कोई संदेह नहीं रह गया है कि दुनिया भर में स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाले पर्यावरणीय कारकों में वायु प्रदूषण पहले नंबर पर है, जो हर आठ में से एक मौत के लिए जिम्मेवार है। जब दुनिया की औसत हकीकत ऐसी है तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारत की कैसी होगी। दुनिया के सोलह सौ शहरों में हवा की गुणवत्ता का अध्ययन करके विश्व स्वास्थ्य संगठन पहले ही बता चुका है कि इनमें दिल्ली की दशा सबसे खराब है। कुछ वर्ष पहले तक यह दर्जा चीन की राजधानी बेजिंग को हासिल था। दिल्ली के अलावा देश के दूसरे शहरों में भी हवा में विषैले तत्त्वों की मौजूदगी बढ़ती जा रही है। नतीजतन, दुनिया के बीस सबसे ज्यादा वायु प्रदूषण वाले शहरों में तेरह अकेले भारत के हैं।

देश के तमाम शहरों में वायु प्रदूषण के खतरनाक स्तर तक पहुंच जाने और कुछ शहरों में खतरे के निशान से भी काफी ऊपर चले जाने का परिणाम साफ है। सांस फूलने की बीमारियां बढ़ रही हैं। फेफड़े कमजोर हो रहे हैं। हाल में हुए एक सर्वे में दिल्ली में चालीस फीसद बच्चों के फेफड़े कमजोर पाए गए। दमे के अलावा हृदय रोग और रक्त विकार भी बढ़ रहे हैं। जहां हवा सांस लेने लायक न रह जाए वहां रोगों और असमय मृत्यु के कारकों का कोई अंत नहीं होगा। इसलिए यह एक ऐसा मसला है जिस पर हमें जल्दी से जल्दी युद्धस्तर पर चेतने की जरूरत है। क्या इसके लक्षण दिख रहे हैं? एक माह पहले पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावडेकर ने कहा था कि वायु प्रदूषण के हालिया आंकड़ों के पीछे ‘निहित स्वार्थी तत्त्वों’ का हाथ है। जहां इस तरह का नकार का नजरिया हो, वहां समस्या को गंभीरता से लिए जाने की कितनी उम्मीद की जा सकती है? पर्यावरण मंत्री खुद पर्यावरण के प्रति संवेदनशील नहीं दिखते। लेकिन वायु प्रदूषण के बहुत खतरनाक स्तर तक पहुंच जाने की गवाही सरकारी आंकड़े भी देते हैं। इसके प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए सरकार ने दिल्ली समेत दस शहरों में वायु गुणवत्ता सूचकांक की शुरुआत की, जिसके तहत इन शहरों की हवा पर हर वक्त नजर रखी जा रही है। इसे निगरानी केंद्रों के डिस्प्ले बोर्डों पर प्रदर्शित किया जाता है।

धीरे-धीरे अपनी हवा की गुणवत्ता जांचने और उसे प्रदर्शित करने वाले शहरों की संख्या बढ़ती जाएगी। लेकिन यह सोचना कि आगाह करने वाले तथ्य बताने से ही फर्क आ जाएगा, निहायत भोलापन होगा। नीतियां बनाने और फैसले करने की जगहों पर जो लोग बैठे हैं उन्हें सोचना चाहिए कि नगर नियोजन, परिवहन, ऊर्जा, औद्योगिक अनुशासन आदि के मद््देनजर सुधार के क्या-क्या कदम उठाए जाएं। प्रधानमंत्री ने पिछले साल दो अक्तूबर को भारत स्वच्छता अभियान शुरू किया। अच्छी बात है। पर इसमें पर्यावरणीय पहलू अभी तक नदारद रहा है, वरना वायु को भी निर्मल बनाने पर जोर दिया जाता। दरअसल, यह एक ऐसा मसला है जिस पर कोई कठोर कदम सरकारें नहीं उठाना चाहतीं, क्योंकि उन्हें डर सताता है कि बहुत-से लोगों की नाराजगी मोल लेनी पड़ेगी। पर समय आ गया है कि इसकी परवाह न कर सख्त कदम उठाए जाएं।

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