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संपादकीय: आतंक के खिलाफ

सेना का दावा है कि मारे गए सभी छह व्यक्ति आतंकवाद से जुड़े थे, जबकि जम्मू-कश्मीर के विपक्षी दलों ने ही नहीं, मुख्यमंत्री ने भी इस मुठभेड़ में नागरिकों के मारे जाने का आरोप लगाया है। इस मसले पर राज्य में पैदा हुए तनाव और सियासी तापमान चढ़ जाने का अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि जम्मू-कश्मीर सरकार ने घाटी के सभी शिक्षण संस्थानों को बुधवार तक बंद रखने का आदेश दिया है।

indian army2015 -17 में सुरक्षा बलों के करीब 400 जवानों ने जान गंवाई (File Pic)

सोमवार को सुरक्षा बलों को एक अहम कामयाबी मिली, जब जैश-ए-मोहम्मद का ऑपरेशनल कमांडर मुफ्ती वकास एक कार्रवाई में मार गिराया गया। वकास ही सुंजवां सैन्य शिविर में हुए आतंकी हमले और दक्षिण कश्मीर के लेथपुरा में सीआरपीएफ के एक शिविर पर हुए आत्मघाती हमले का मुख्य षड्यंत्रकारी था। जाहिर है, वकास के मारे जाने से जैश को जबर्दस्त झटका लगा है। इससे पहले, जैश को ऐसा ही झटका तब भी लगा था जब दिसंबर में उसके एक और कमांडर नूर मोहम्मद तांत्रेय को सुरक्षा बलों ने मार गिराया था। इसके अलावा, मेजर आदित्य कुमार के खिलाफ किसी भी तरह की जांच पर रोक लगाने के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से भी सेना ने राहत की सांस ली होगी। गौरतलब है कि सत्ताईस जनवरी को शोपियां में पथराव कर रही भीड़ पर सैन्यकर्मियों की गोलीबारी में तीन व्यक्तियों की मौत हो गई थी। इसके बाद मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने घटना की जांच के आदेश दिए और धारा 302 व धारा 307 के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई। इस प्राथमिकी ने केंद्र सरकार और मुख्यमंत्री को आमने-सामने कर दिया। भाजपा और पीडीपी के गठबंधन का अंतर्विरोध एक बार फिर खुलकर सामने आ गया।

केंद्र सरकार जहां मेजर आदित्य और सत्ताईस जनवरी की कार्रवाई में शामिल रहे अन्य सैनिकों के बचाव में खड़ी रही है, वहीं पीडीपी का कहना था कि अफस्पा के तहत मिले विशेष अधिकारों से सैन्य अधिकारियों को किसी को जान से मारने का लाइसेंस नहीं मिल जाता। जबकि केंद्र ने अफस्पा यानी सशस्त्र बल विशेषाधिकर अधिनियम की धारा-सात के तहत सेना को मिली छूट को जायज ठहराते हुए और उसका हवाला देते हुए कहा कि सैन्य अधिकारी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज नहीं की जा सकती। इस मामले में अंतिम सुनवाई चौबीस अप्रैल को होगी, पर सर्वोच्च न्यायालय के रुख का थोड़ा-बहुत अंदाजा उसकी इस टिप्पणी से लगाया जा सकता है कि मेजर आदित्य सैन्य अफसर हैं, उनके साथ अपराधी जैसा बर्ताव नहीं किया जा सकता। इस प्रकरण से जाहिर है कि जम्मू-कश्मीर में सेना की आतंकवाद विरोधी कार्रवाइयों को कानूनी और राजनीतिक विवादों का भी सामना करना पड़ रहा है। सत्ताईस जनवरी की घटना को लेकर चला आ रहा विवाद ठंडा भी नहीं हुआ कि रविवार को शोपियां जिले के पहनू इलाके में सेना और आतंकियों के बीच हुई मुठभेड़ को लेकर भी विवाद शुरू हो गया है। शोपियां गोलीबारी में मरने वालों की संख्या छह तक पहुंच गई है।

सेना का दावा है कि मारे गए सभी छह व्यक्ति आतंकवाद से जुड़े थे, जबकि जम्मू-कश्मीर के विपक्षी दलों ने ही नहीं, मुख्यमंत्री ने भी इस मुठभेड़ में नागरिकों के मारे जाने का आरोप लगाया है। इस मसले पर राज्य में पैदा हुए तनाव और सियासी तापमान चढ़ जाने का अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि जम्मू-कश्मीर सरकार ने घाटी के सभी शिक्षण संस्थानों को बुधवार तक बंद रखने का आदेश दिया है। यही नहीं, एहतियात के तौर पर स्टेट बोर्ड ऑफ स्कूल एजुकेशन ने छह और सात मार्च को होने वाली सभी परीक्षाएं स्थगित कर दी हैं। पीडीपी के अलावा घाटी में आधार रखने वाले अन्य दलों ने भी रविवार को हुई कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। खबरों के मुताबिक स्थानीय लोगों का आरोप है कि सेना ने दो आतंकियों के अलावा चार आम नागरिकों को भी मार डाला। ‘संयुक्त प्रतिरोध इकाई’ ने सात मार्च को कश्मीर बंद का आह्वान किया है। केंद्र सरकार स्वाभाविक ही सेना के साथ खड़ी है, पर उसे विवादों के राजनीतिक समाधान की भी विश्वसनीय पहल करनी चाहिए।

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