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संपादकीय: वार्ता के बाद

आर्थिक मामलों के अनेक विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और चीन के बिगड़ते व्यापारिक रिश्तों का लाभ भारत को मिल सकता है, वह इस मौके का फायदा उठा कर चीन को अपना निर्यात बढ़ा सकता है।

Author May 7, 2018 3:32 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

भारत में बनने वाली अट्ठाईस दवाओं पर से आयात शुल्क हटाने का चीन का फैसला भारतीय दवा उद्योग एक अच्छी खबर है। साथ ही, चीन के इस कदम ने द्विपक्षीय व्यापार असंतुलन कम होने की उम्मीद जगाई है। गौरतलब है कि चीन का ताजा फैसला उसके राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हुई अनौपचारिक शिखर वार्ता के हफ्ते भर बाद आया है। इसलिए इसे स्वाभाविक ही शिखर वार्ता से जोड़ कर देखा जा रहा है। पर इस दिशा में पहल और पहले हो चुकी थी। मार्च में दोनों तरफ के वाणिज्यमंत्रियों और उच्चाधिकारियों की नई दिल्ली में हुई बैठक में चीन ने भरोसा दिलाया था कि वह कृषि उत्पाद, दवाएं और सूचना प्रौद्योगिकी जैसे कई क्षेत्रों में भारतीय निर्यात के सामने आने वाली अड़चनें दूर करने का प्रयास करेगा। और पीछे जाएं, तो सितंबर 2014 में दोनों देशों के बीच पांच साल का द्विपक्षीय व्यापार संतुलन करार भी हुआ था। पर विडंबना यह है कि इस समझौते के बाद से चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा लगातार बढ़ता रहा है। दरअसल, वह करार बाध्यकारी नहीं था, और चीन अपने दिए आश्वासनों को कब रद््दी की टोकरी में या ठंडे बस्ते में डाल दे, इसका भारत को बहुत बार अनुभव हो चुका है। संभव है अनौपचारिक शिखर वार्ता के बाद चीन ने भरोसा बहाली की दिशा में कुछ करना जरूरी समझा हो। पर व्यापार घाटा कम करने की जिम्मेदारी चीन पर डाल कर भारत के लिए निश्चिंत हो जाना ठीक नहीं होगा।

दरअसल, यह ऐसा मसला है जिससे भारत को अपनी कारोबारी तैयारी और दक्षता से ही निपटना होगा। भारत को अपनी पहचान सस्ते और गुणवत्तापूर्ण सामान के उत्पादक के रूप में बनानी होगी। अपने निर्यातकों को प्रोत्साहन देना होगा। लागत कम करनी होगी। ऐसे क्षेत्रों को चिह्नित करना होगा, जिनमें भारत आसानी से ज्यादा प्रतिस्पर्धी हो सके। दवा उद्योग इनमें से एक है। भारत की पुरानी मांग थी कि उसकी कंपनियों को दवा निर्यात में छूट बढ़ाई जाए। चीन ने 2016 में उनतालीस दवाओं के निर्यात की अनुमति भारतीय कंपनियों को दी थी, जिनमें से सत्रह दवाएं कैंसर की हैं। कैंसर की सस्ती और अच्छी दवाएं भारतीय कंपनियों की मानी जाती हैं। एक मोटे हिसाब के मुताबिक, चीन में कैंसर की दवाओं का सालाना बाजार उन्नीस-बीस अरब डॉलर है। भारत का व्यापार घाटा इतना ज्यादा है कि चीन के ताजा फैसले से कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा, पर कारोबारी माहौल में सुधार का संदेश जरूर गया है। और अगर यह बना रहता है तथा इस दिशा में कुछ और कदम उठाए जाते हैं तो चीन के साथ व्यापार घाटे से भारत को राहत मिल सकती है।

पिछले दिनों अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक तनाव बढ़ा है। अमेरिका ने चीन से आने वाली बहुत-सी चीजों पर पच्चीस फीसद आयात शुल्क लगा दिया, तो पलटवार करते हुए चीन ने भी वैसा ही कदम उठाया। इस तनातनी को व्यापारिक युद्ध तक कहा गया। आर्थिक मामलों के अनेक विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और चीन के बिगड़ते व्यापारिक रिश्तों का लाभ भारत को मिल सकता है, वह इस मौके का फायदा उठा कर चीन को अपना निर्यात बढ़ा सकता है। पर कल अमेरिका और चीन के व्यापारिक रिश्ते सुधार जाएं तो? लिहाजा, हमें चीन से व्यापारिक असंतुलन दूर करने की टिकाऊ रणनीति बनानी होगी।

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