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संपादकीय: लापरवाही के बाद

पिछले कुछ दिनों के दौरान बच्चों के लिए बनाए गए कई अन्य बाल संरक्षण गृहों से भी शोषण और उत्पीड़न की खबरें आई हैं। इसके बाद देश भर में पैदा आक्रोश और जांच की संभावना को देखते हुए इन आपराधिक गतिविधियों को अंजाम देने वाले लोग क्या अपने बचाव में नहीं लग गए होंगे और क्या इसका असर जांच पर नहीं पड़ेगा?

Author August 10, 2018 1:54 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

हाल में बिहार और उत्तर प्रदेश में बेसहारा बच्चियों के लिए चलाए जा रहे आश्रय स्थलों से उजागर हुए यौन-उत्पीड़न के मामलों से साफ है कि उनके संचालन में भ्रष्टाचार गहरे पैठा हुआ था। सरकार की आर्थिक मदद से चलने वाले बालिका गृहों में शरण ली हुई बच्चियों के जीवन को एक तरह से शोषण, बलात्कार और उत्पीड़न के अड्डों में तब्दील कर दिया गया था। हैरानी की बात यह है कि लंबे समय से इस तरह की गतिविधियां चलने के बावजूद संबंधित सरकारी महकमों और उनके अधिकारियों को उनमें कुछ भी गलत होता नहीं दिखा। जबकि मुजफ्फरपुर के बालिका गृह का सोशल आॅडिट यानी सामाजिक अंकेक्षण करते हुए टाटा इंस्टीट्यूट आॅफ सोशल साइंसेज के अध्ययनकर्ताओं ने वहां रह रही बच्चियों के जिस त्रासद जीवन का ब्योरा दर्ज किया, उससे समूचे देश में क्षोभ पैदा हुआ। ज्यादा अफसोसनाक बात यह है कि किन्हीं वजहों से अपने घर-परिवार से बिछड़ गई लाचार बच्चियों ने जिन आश्रय स्थलों में जीवन बचाने के लिए शरण ली, वहां उन्हें यौन उत्पीड़न के एक नए कुचक्र में झोंक दिया गया।

सवाल है कि अगर यह सोशल आॅडिट का काम नहीं हुआ होता तो क्या वहां वे गतिविधियां पहले की तरह चलती रहतीं? किसी गैरसरकारी संगठन के जरिए संचालित उन आश्रय स्थलों की निगरानी और जांच-पड़ताल क्या उन सरकारी महकमों का दायित्व नहीं है, जो उन संस्थाओं को आर्थिक मदद मुहैया कराते हैं? अब जब मुजफ्फरपुर और देवरिया में बने आश्रय स्थलों में बच्चियों के शोषण से लेकर बलात्कार या फिर उन्हें देह-व्यापार में झोंकने के मामले सामने आए हैं, तब केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने अगले दो महीने के भीतर नौ हजार से ज्यादा बाल देखभाल गृहों के सोशल आॅडिट का आदेश दिया है। हालांकि इसी महकमे की मंत्री का कहना है कि हमने गैरसरकारी संगठनों से आश्रय गृहों का आॅडिट कराया और वहां कुछ भी असामान्य नहीं दिखा, जिसका मतलब था कि उन्होंने इसे व्यापक तरीके से नहीं लिया। अब मंत्रालय ने अगर नए सिरे से आश्रय स्थलों के सामाजिक अंकेक्षण का आदेश दिया है, तो उसमें पिछले अनुभवों से कितनी सीख ली जाएगी? खबरों में यह तथ्य भी सामने आया है कि एक जांच के बाद देवरिया में विवादित गैरसरकारी संगठन मां विंध्यवासिनी महिला और बालिका संस्कार का लाइसेंस पिछले साल जून में ही राज्य सरकार ने रद्द कर दिया था। आखिर उसके बाद भी यह संगठन अपनी गतिविधियां कैसे संचालित करता रहा?

पिछले कुछ दिनों के दौरान बच्चों के लिए बनाए गए कई अन्य बाल संरक्षण गृहों से भी शोषण और उत्पीड़न की खबरें आई हैं। इसके बाद देश भर में पैदा आक्रोश और जांच की संभावना को देखते हुए इन आपराधिक गतिविधियों को अंजाम देने वाले लोग क्या अपने बचाव में नहीं लग गए होंगे और क्या इसका असर जांच पर नहीं पड़ेगा? दरअसल, जिन आश्रय स्थलों की निगरानी और जांच के साथ सोशल आॅडिट एक नियमित व्यवस्था होनी चाहिए, उसे लेकर इतनी देर से की गई पहलकदमी यह दर्शाती है कि सरकारी महकमों की नींद तभी खुलती है, जब कोई बड़ा नुकसान हो चुका होता है या किसी तरह वह सार्वजनिक चर्चा में आ जाता है। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि देश में जितने भी बाल देखभाल संस्थानों के संचालन के लिए सरकार गैरसरकारी संगठन को आर्थिक मदद मुहैया कराती है, वहां रखे गए बच्चों के साथ कुछ भी बुरा घटित होने की जिम्मेदारी उस पर आती है।

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