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काबुल में आतंक

सोमवार को काबुल में हुए आतंकवादी हमले ने अफगानिस्तान में सुरक्षा की स्थिति को लेकर नए सिरे से चिंता पैदा की है। इस हमले में एक बच्चे समेत दो व्यक्तियों की मौत हो गई और इकतीस लोग घायल हो गए। यों इसकी तुलना में तालिबान ने बहुत-से इससे ज्यादा त्रासद हमले किए हैं। लेकिन ताजा […]

Author June 24, 2015 5:29 PM

सोमवार को काबुल में हुए आतंकवादी हमले ने अफगानिस्तान में सुरक्षा की स्थिति को लेकर नए सिरे से चिंता पैदा की है। इस हमले में एक बच्चे समेत दो व्यक्तियों की मौत हो गई और इकतीस लोग घायल हो गए। यों इसकी तुलना में तालिबान ने बहुत-से इससे ज्यादा त्रासद हमले किए हैं। लेकिन ताजा हमले का सबसे खास पहलू यह है कि आतंकवादियों ने इसे कहीं दूरदराज नहीं बल्कि अफगानिस्तान की सत्ता के बिल्कुल केंद्र पर अंजाम दिया। सात आत्मघाती हमलावरों ने संसद भवन पर धावा बोला। उनके किए धमाकों और गोलाबारी के चलते संसद भवन में अफरातफरी मच गई। टीवी प्रसारण में सांसद जान बचाने के लिए इधर-उधर भागते देखे गए। तालिबान ने इस हमले के लिए जो वक्त चुना वह भी गौरतलब है।

हमला तब हुआ जब अफगान राष्ट्रपति की ओर से रक्षामंत्री पद के लिए नामांकित प्रतिनिधि का संसद में परिचय दिया जाना था। अफगानिस्तान में पिछले साल सितंबर में अशरफ गनी ने राष्ट्रपति के तौर पर देश की कमान संभाली थी। तब से वहां रक्षामंत्री का पद रिक्त था। संसद की बैठक और नए रक्षामंत्री के पदारोहण के वक्त ज्यादा चौकसी बरतना एक सामान्य तकाजा था। अफगान सरकार इसे समझने में क्यों नाकाम रही? अफगानिस्तान के सबसे महत्त्वपूर्ण ठिकाने और एक बहुत महत्त्वपूर्ण अवसर पर हुए हमले से जाहिर है कि वहां तालिबान का खतरा किस हद तक बना हुआ है। दूसरे, पिछले साल दिसंबर में नाटो बलों ने अफगानिस्तान में अपना अभियान समाप्त कर दिया था; उनकी वापसी के बाद अफगान सुरक्षा बलों की क्षमता बढ़ाए जाने की बातें की जा रही थीं। पर वह उम्मीद अभी लक्ष्य से काफी दूर है।

अरसे तक नाटो बलों की कार्रवाई के बाद भी आखिरकार तालिबान इतना ताकतवर क्यों है? इसकी एक बड़ी वजह यह मानी जाती है कि अफगानिस्तान से लगे पाकिस्तान के सरहदी इलाकों में उन्हें छिपने के ठिकाने मिल जाते हैं। पाकिस्तान के कई कट्टरपंथी-आतंकवादी गुटों से उनके तार जुड़े हुए हैं और उनसे मदद मिलती रहती है। इसमें खासकर हक्कानी गुट का नाम लिया जाता है। यों पिछले महीने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने कहा था कि जो अफगानिस्तान के दुश्मन हैं वे पाकिस्तान के दोस्त नहीं हो सकते। लेकिन सच यह है कि तालिबान पाकिस्तान की जमीन का इस्तेमाल न कर पाए यह सुनिश्चित करने की जहमत पाकिस्तान ने ज्यादा नहीं उठाई है, न हक्कानी गुट और ऐसे दूसरे गिरोहों पर नकेल कसने की तत्परता दिखाई है।

इस सिलसिले में पाकिस्तानी फौज की अनिच्छा कई बार उजागर हुई है। फिर, इराक और सीरिया में आइएस के उभार ने दहशतगर्दों के हौसले बुलंद किए हैं। इससे न सिर्फ इराक लहूलुहान हुआ है और अफगानिस्तान को खतरा बढ़ा है, बल्कि इन दोनों के पड़ोसी ईरान की भी मुसीबत बढ़ी है। यही नहीं, इराक-सीरिया में आइएस के पैर जमाने और तालिबान की सक्रियता ने दहशतगर्दी का साया मध्य एशिया तक पहुंच जाने का अंदेशा पैदा किया है। यों तालिबान से खतरा पाकिस्तान को भी कम नहीं है, पर अफगानिस्तान में अस्थिरता की सूरत में वहां टांग अड़ाने या पैर पसारने का लोभ पाकिस्तान के राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व में कर्तव्य-विवेक को निष्क्रिय कर देता है। विडंबना यह है कि आइएस से निपटने की फिलवक्त कोई अंतरराष्ट्रीय रणनीति दिखाई नहीं पड़ती।

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