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संपादकीयः काबुल में आतंक

अफगानिस्तान इन दिनों राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है। वहां हुए राष्ट्रपति चुनाव नतीजों के बाद दो लोगों ने अपने को राष्ट्रपति घोषित कर दिया है। अशरफ गनी को सबसे अधिक मत मिले थे, पर अब्दुल्ला अब्दुल्ला ने मतदान में धांधली का आरोप लगाते हुए चुनौती दी थी।

Author Published on: March 27, 2020 12:09 AM
अफगानिस्तान की राजधानी काबुल के एक गुरुद्वारे पर हमला कर आतंकियों ने एक बार फिर चुनौती पेश की है।

अफगानिस्तान की राजधानी काबुल के एक गुरुद्वारे पर हमला कर आतंकियों ने एक बार फिर चुनौती पेश की है। स्थानीय समय के मुताबिक सुबह करीब पौने आठ बजे चार हथियारबंद आतंकी गुरुद्वारे के धर्मशाले में घुसे और गोलियां बरसानी शुरू कर दी। उस वक्त करीब डेढ़ सौ लोग वहां ठहरे थे। इस गोलीबारी में पच्चीस से ऊपर लोगों के मारे जाने और करीब आठ के गंभीर रूप से घायल होने की खबर मिली है। इस घटना की जिम्मेदारी चरमपंथी संगठन आइएस खोरासन ने ली है। पर कयास लगाए जा रहे हैं कि उसने यह हमला लश्कर-ए-तैयबा और हक्कानी समूह के साथ मिल कर किया है। दो साल पहले भी आइएस ने अफगानिस्तान के एक गुरुद्वारे पर हमला किया था, जिसमें उन्नीस लोग मारे गए थे। अफगानिस्तान में सिख उपासना स्थल पर यह अब तक का सबसे बड़ा हमला है। स्वाभाविक ही इससे सिख समुदाय में रोष है और भारत सरकार ने इसकी कड़ी निंदा करते हुए वहां की सरकार से जिम्मेदार संगठनों के खिलाफ सख्त कदम उठाने को कहा है।

अफगानिस्तान इन दिनों राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है। वहां हुए राष्ट्रपति चुनाव नतीजों के बाद दो लोगों ने अपने को राष्ट्रपति घोषित कर दिया है। अशरफ गनी को सबसे अधिक मत मिले थे, पर अब्दुल्ला अब्दुल्ला ने मतदान में धांधली का आरोप लगाते हुए चुनौती दी थी। हालांकि अशरफ गनी ने राष्ट्रपति पद की शपथ ले ली है, पर उनके शपथ ग्रहण समारोह के दौरान भी आतंकी हमला किया गया था। जाहिर है, वहां के आतंकी संगठन उनके विरोध में हैं। हालांकि काबुल के गुरुद्वारे पर हुए हमले का ताल्लुक राष्ट्रपति चुनाव नतीजों से नहीं जोड़ा जा सकता, पर इससे यह जाहिर होता है कि आतंकी संगठनों पर नकेल कसना या उनसे बातचीत कर वहां शांति बहाली की दिशा में आगे बढ़ना चुनौती बना हुआ है। अफगानिस्तान से भारत के रिश्ते मधुर रहे हैं, इसलिए वहां विकास कार्यक्रमों, व्यापार और रोजगार के क्षेत्र में भारतीय मूल के लोगों की सहभागिता काफी है। सिख समुदाय के लोग वहां लंबे समय से जाकर बसे हुए हैं। मगर वहां अमेरिकी हस्तक्षेप से स्थितियां बिगड़ी हैं। जबसे वहां से नाटो देशों की सेनाएं हटी हैं, तबसे अफगानिस्तान में विदेशियों पर आतंकी हमले बढ़े हैं। एक तो इन चरमपंथी संगठनों को लगता रहा है कि बाहर से आए लोग उनकी संस्कृति को बिगाड़ रहे हैं और भारतीय नागरिकों के विकास परियोजनाओं में शरीक होने से सरकार पर उनका दबदबा कमजोर हो रहा है।

सिख उपासना स्थल पर हमले के पीछे बड़ी वजह भारत से आतंकी समूहों की नाराजगी है। आइएस की जड़ें भारत में भी फैली हैं, यहां से जाकर कई युवक उसमें शामिल हुए हैं। फिर कश्मीर से अनुच्छेद तीन सौ सत्तर हटने और नागरिकता संशोधन कानून पारित होने के बाद से बड़े पैमाने पर यह भ्रम फैला है कि भारत सरकार मुसलमानों के विरोध में कदम उठा रही है। इसी की प्रतिक्रिया में कुछ महीने पहले पाकिस्तान के ननकाना साहब गुरुद्वारे पर हमला हुआ था और वहां सिखों को भारत लौटने को कहा गया था। अफगानिस्तान में भी सिखों को निशाना बनाने के पीछे यही कारण है कि इस तरह वहां के चरमपंथी संगठन भारत को संदेश देना चाहते होंगे कि मुसलिम समुदाय के साथ किसी भी तरह के भेदभाव का बदला वे इसी तरह लेंगे। ऐसे में अफगानिस्तान सरकार उनके मनोबल को तोड़ने के लिए सख्त कदम नहीं उठाएगी, तो उसका असर भारत के साथ संबंधों पर पड़ेगा।

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