ताज़ा खबर
 

संपादकीयः गहराता संकट

अभी देखना यह होगा कि तालिबान कैदियों की रिहाई की कवायद कैसे सिरे चढ़ती है। जहां तालिबान एक साथ कैदियों की रिहाई की मांग पर तुला है, वहीं गनी सरकार ने टुकड़ों-टुकड़ों में रिहाई करने की बात कही है। जाहिर है, भारी दबाव के बावजूद गनी संतुलन बनाए रखने की रणनीति पर चल रहे हैं।

jansatta editorial sampadakiye column, ashraf ghani, ashraf ghani elected president again, jansatta editorial, jansatta editorial column, jansatta editorial column in hindi, jansatta sampadakiye, jansatta epaper, jansatta hindi epaper, jansatta hindi epaper editorial column, jansatta, संपादकीय, जनसत्ता संपादकीयशांति समझौते के बाद गनी ने कड़ा रुख अपनाया था और तालिबान कैदियों की रिहाई से साफ इनकार कर दिया था।

अफगानिस्तान में घटनाएं जिस तेजी से करवट ले रही हैं, उससे इस देश के भविष्य को लेकर कोई अच्छे संकेत नहीं मिल रहे। अमेरिका और तालिबान के बीच शांति समझौता हुए अभी एक पखवाड़ा भी नहीं गुजरा है कि देश नए संकटों में धंसता जा रहा है। शांति समझौते से लगा था कि अफगानी जनता अब हिंसा और युद्ध से मुक्ति पा जाएगी। लेकिन इस समझौते की बुनियाद में कुछ ऐसे मुद्दे मौजूद हैं जिनसे अफगानिस्तान ज्यादा बड़ी मुश्किलों से घिरता जा रहा है। डेढ़ दशक से भी ज्यादा से समय से अमेरिकी और नाटो सैनिक अफगानिस्तान में अड्डा बनाए हुए थे और तालिबान उनके साथ युद्धरत था। ऐसे में अमेरिकी-नाटो सैनिकों की वापसी तालिबान और अफगानी जनता के लिए उम्मीदें लिए हुई थी। लेकिन शांति समझौते के बाद तालिबान की बढ़ती हिंसा ने उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। सबसे बड़ा मुद्दा पांच हजार तालिबान कैदियों की रिहाई का है। हालांकि राष्ट्रपति अशरफ गनी ने अब जिस तरह से तालिबान कैदियों को छोड़ने की मांग मान ली है, उससे साफ है कि वे कहीं न कहीं भारी दबाव में हैं। भले वह दबाव अमेरिका का हो, या तालिबान नेताओं का या देश के राजनीतिक हालात का। शांति समझौते के बाद गनी ने कड़ा रुख अपनाया था और तालिबान कैदियों की रिहाई से साफ इनकार कर दिया था।

बड़ा सवाल यह है कि आखिर गनी को अपना रुख बदलने को क्यों मजबूर होना पड़ा? जबकि वे इस बात को अच्छी तरह समझ रहे हैं कि तालिबान कैदियों की रिहाई के दूरगामी नतीजे क्या होंगे। समझौते में अमेरिका ने तालिबान कैदियों की रिहाई का जो वादा किया था, उसमें अफगानिस्तान की निर्वाचित सरकार की कोई भूमिका नहीं थी, न ही राष्ट्रपति अशरफ गनी से इस बारे में कोई सलाह-मशविरा किया था। गनी की आपत्ति इसी बात को लेकर थी कि तालिबान कैदियों की रिहाई का फैसला अमेरिका कैसे कर सकता है! यह अमेरिका के अधिकार के दायरे के बाहर है। समझौते में जिस तरह से अफगान सरकार को दरकिनार किया गया, उसका मतलब साफ है कि अमेरिका किसी भी कीमत पर अफगानिस्तान से पिंड छुड़ाने में लगा था। उसे इससे कोई मतलब नहीं था कि बाद में तालिबान यहां क्या करेगा। इसलिए यह शांति समझौता अफगानिस्तान के लिए नए और गंभीर संकटों को जन्म देने वाला है। तालिबान कैदियों की रिहाई की बात मानने को बाध्य होना इस बात का प्रमाण है कि राष्ट्रपति गनी कहीं न कहीं कमजोर साबित हो रहे हैं। यह अफगानिस्तान में तालिबान का नए सिरे से उदय भी होगा।

अभी देखना यह होगा कि तालिबान कैदियों की रिहाई की कवायद कैसे सिरे चढ़ती है। जहां तालिबान एक साथ कैदियों की रिहाई की मांग पर तुला है, वहीं गनी सरकार ने टुकड़ों-टुकड़ों में रिहाई करने की बात कही है। जाहिर है, भारी दबाव के बावजूद गनी संतुलन बनाए रखने की रणनीति पर चल रहे हैं। पिछले हफ्ते गनी ने दूसरी बार अफगानिस्तान के राष्ट्रपति पद की शपथ ली थी। लेकिन उनके प्रतिद्वंद्वी अब्दुल्ला अब्दुल्ला ने भी अपने को समानातंर राष्ट्रपति घोषित करते हुए एक समारोह में बाकायदा राष्ट्रपति की शपथ ले ली। पिछले साल सितंबर में हुए राष्ट्रपति चुनाव में अब्दुल्ला अब्दुल्ला ने गनी पर चुनाव धांधली का आरोप लगाया था। ऐसे में यह राजनीतिक टकराव तालिबान को फायदा पहुंचाएगा और अब्दुल्ला अब्दुल्ला तालिबान को हवा देकर गनी के लिए बड़ा खतरा बनेंगे। अगर गनी सारे तालिबान कैदियों को छोड़ भी देते हैं तो इस बात की क्या गारंटी है कि तालिबान उन्हें सत्ता में बने रहने देगा!

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 संपादकीयः चिंता के बावजूद
2 संपादकीयः सद्भाव के रंग
3 संपादकीयः बदलती वफादारी
ये पढ़ा क्या?
X