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योगी की अगुआई

उत्तर प्रदेश का चुनाव भाजपा ने नरेंद्र मोदी की अगुआई और विकास के मुद्दे पर लड़ा। वहां मुख्यमंत्री का कोई चेहरा नहीं था। मोदी पर भरोसा करके ही लोगों ने पार्टी को भारी बहुमत दिया।

योगी आदित्यनाथ को शनिवार को बीजेपी ने यूपी में विधायक दल का नेता चुना है।

आखिर हफ्ते भर मंथन के बाद भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश की अगुआई योगी आदित्यनाथ को सौंप दी। इस फैसले पर स्वाभाविक ही कई तरह की प्रतिक्रियाएं उभर रही हैं। हालांकि योगी को उनके समर्थक मुख्यमंत्री के दावेदार के रूप में करीब साल भर पहले से पेश कर रहे थे, पर उनकी छवि एक विवादित नेता की होने के चलते इस दावे को बहुत गंभीरता से नहीं लिया जा रहा था। उत्तर प्रदेश का चुनाव भाजपा ने नरेंद्र मोदी की अगुआई और विकास के मुद्दे पर लड़ा। वहां मुख्यमंत्री का कोई चेहरा नहीं था। मोदी पर भरोसा करके ही लोगों ने पार्टी को भारी बहुमत दिया। मगर योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री चुनने से जाहिर हो गया कि भाजपा बेशक विकास की बात करती रही हो, पर हिंदुत्व उसके एजंडे में सबसे ऊपर है। लोकसभा चुनाव में भी उसे उत्तर प्रदेश में अप्रत्याशित कामयाबी मिली तो पार्टी ने माना था कि हिंदुत्व के एजंडे पर ही उसे व्यापक समर्थन मिला है। विधानसभा चुनाव के समय भी टिकट बांटते समय और फिर चुनाव प्रचार में वही भरोसा सबसे ऊपर नजर आ रहा था। अब पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को यकीन हो गया है कि हिंदुत्व के एजंडे पर चलते हुए ही उन्हें स्थायी लाभ मिल सकता है। योगी का चुनाव भी इसी दबाव में हुआ है।

योगी आदित्यनाथ के दो उपमुख्यमंत्रियों और पैंतालीस सदस्यों वाले मंत्रिमंडल में छह महिलाओं और एक मुसलमान सहित अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों को जोड़ कर संतुलन बनाने की कोशिश दिखाई देती है। मगर अपने कामकाज से वे लोगों के बीच कितना भरोसा जगा पाते हैं, देखने की बात है। योगी आदित्यनाथ तेज-तर्रार हिंदुत्ववादी नेता माने जाते हैं। अक्सर उनके तल्ख बयानों के चलते विवाद पैदा होते रहे हैं। उन्होंने हिंदू युवा वाहिनी गठित की थी, जिसकी गतिविधियां हमेशा सामाजिक विद्वेष पैदा करने का सबब बनती रही हैं। यहां तक कि योगी खुद कई बार भाजपा की रीति-नीतियों के विरूद्ध बगावती तेवर अपनाते देखे गए हैं। ऐसे में वे किस प्रकार राज्य के वरिष्ठ नेताओं और केंद्रीय नेतृत्व के साथ तालमेल बैठा कर काम कर पाते हैं, इंतजार करना होगा। उनके सामने राज्य से जुड़ी समस्याओं को निपटाने के अलावा भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व और फिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एजंडों का भी दबाव होगा, जिन्हें पूरा करना खासी बड़ी चुनौती है।

योगी सरकार के सामने पहली चुनौती कानून-व्यवस्था सुधारने की होगी। सपा और बसपा सरकारों के दौर में सबसे अधिक आरोप कानून-व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति को लेकर लगते रहे हैं। भाजपा का भी यह सबसे बड़ा मुद्दा रहा है। ऐसे में सपा और बसपा सरकारों के दौर में अनुकूलित हो चुके अधिकारियों को योगी किस प्रकार नियंत्रित-संचालित करते हैं, यह भी उनका प्रशासकीय कौशल का परिचायक होगा। फिर जिस विकास के पैमाने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उत्तर प्रदेश को आगे बढ़ाने की रूपरेखा खींच चुके हैं और इसके जरिए वे एक नया भारत रचने का नारा भी दे चुके हैं, योगी के कंधों पर उसे पूरा करने का भार है। अयोध्या में लंबे समय से लटका राम मंदिर बनवाना एक बड़ा मुद्दा है, जिसे पूरा करना शायद योगी के लिए मुश्किल नहीं होगा, पर वे सामाजिक सौहार्द को बनाए रख कर यह काम कैसे करेंगे, कहना मुश्किल है। अपने दो उपमुख्यमंत्रियों के साथ तालमेल बिठाते हुए अगर वे इन मोर्चों पर संतुलन बनाने में कामयाब नहीं होंगे, तो अगले महत्त्वाकांक्षी आम चुनाव में भाजपा की कामयाबी संदिग्ध होगी।

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