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गुम होते गांव

गांव का शहर में विलीन हो जाना या कहिए कि शहर का गांव में घुस कर गांव की पहचान मिटा देना कितना सुखद है! सुखद है भी या नहीं, इसे तो किसानी से विमुख हो चुकी किसानों की नई पीढ़ी बेहतर जानती होगी।

mp-school-in-worst-conditionगांव में बच्चों को अकेले पढ़ाते हैं टीचर मदन गोपाल सोनी।

शोभना विज 

बदलते समय के साथ बदल रहे मानवीय सरोकारों को लेकर अक्सर थोड़ी निराशा होती है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। एक बड़ी वजह यह है कि पीढ़ियों से अर्जित किए हुए हमारे कुछ संकल्प और संस्कार क्षरित होते जा रहे हैं और वह भी आधुनिकता के नाम पर। इस पर जब विचार करती हूं तो आमतौर पर एक जगह पर आकर मेरे चिंतन की सुई अटक जाती है। यह बिंदु है बढ़ते हुए शहरीकरण के कारण हमारे गांवों से ‘गांव’ का खारिज होते जाना, यानी गांवों के भीतर ही ‘गांव’ का न रहना। अपने शहर की हदों से थोड़ा बाहर निकल कर पड़ताल करें तो आसानी से इस बात की पुष्टि हो जाती है। बीते दो-ढाई दशकों में शहरों से सटे अनगिनत गांव अपनी पहचान लगभग खो चुके हैं। इतिहास बन चुके ये गांव एक बदले हुए भूगोल के साथ आज शहर का हिस्सा हो गए हैं।

गांव का शहर में विलीन हो जाना या कहिए कि शहर का गांव में घुस कर गांव की पहचान मिटा देना कितना सुखद है! सुखद है भी या नहीं, इसे तो किसानी से विमुख हो चुकी किसानों की नई पीढ़ी बेहतर जानती होगी। मैं तो देश के उन लाखों-करोड़ों मध्यम श्रेणी के लोगों में से एक हूं, जिनका न महानगरों से और न ही कभी गांव-देहात से कोई सीधा संपर्क रहा है। हर शाम एफएम पर ‘किसान वाणी’ सुनने, पर्यावरण से जुड़ी रचनाएं शौक से पढ़ने या यू-ट्यूब पर जैविक खेती-बागवानी के वीडियो देखने को अगर मैं अपना जुनून कहती हूं तो इसका एकमात्र कारण धरती की मिट्टी से मेरा लगाव है।कुछ समय पहले बरसों बाद, एक गांव में जाने का संयोग बना। शहर से केवल आठ-दस मील की दूरी पर स्थित होने के कारण यह अपेक्षा तो नहीं थी कि यह गांव मेरी ड्राइंगरूम की पेंटिंग वाला गांव होगा, जिसमें खपरैल की छतों वाले छोटे-छोटे घर हैं, कच्चे रास्ते पर अनाज के बोरों से लदी बैलगाड़ी को हांकता हुआ एक किसान है और सिर पर पानी का घड़ा उठाए एक औरत चली आ रही है। हालांकि यह सुनने में आता है कि दूरदराज के क्षेत्रों में स्थित गांवों में आज भी ऐसे परिदृश्य देखने को मिल जाते हैं। लेकिन इधर जो देखा वह हैरान-परेशान करने वाला था। मीलों लंबी वह मुख्य सड़क, जो कभी दूर-दूर तक हरे-भरे खेतों से घिरी होती थीं, अब देखते ही देखते एक दोहरी और बेहद व्यस्त सड़क में तब्दील हो चुकी थी। सड़क के दोनों ओर बड़े-बड़े शोरूम, उनके पीछे बनीं आवासीय कालोनियों, आधुनिक शिक्षा वाले निजी स्कूलों की भव्य इमारतों ने वृक्षों और लहलहाती फसलों को खदेड़ कर पूरे ग्राम्य परिवेश को निगल लिया था।

हो सकता है कि उन भव्य इमारतों में बने घरों के भीतर कहीं बालकनी में या फिर छत पर कोई आभासी गांव जैसा रच कर गांव महसूस करने की कोशिश की जा रही हो! खैर, गंतव्य पर पहुंचे तो पता चला कि गांव आधा सड़क के बायीं तरफ और आधा दाहिनी तरफ है। यानी अपने रास्ते में पड़ते उस बेचारे गांव को चीर कर दो-फाड़ करती हुई सड़क वेग से आगे निकल गई थी। बायीं ओर एक विशाल मैरिज-पैलेस यानी विवाह या कोई समारोह आयोजित करने करने वाला भवन दिखाई दिया। दाहिनी ओर ग्राम-पंचायत का बहुत बड़ा भूखंड था। ग्रामीण घर कहीं दूर थे जो दिखाई नहीं पड़ रहे थे। खाली पड़ी जमीन के एक छोटे हिस्से पर दृष्टिबाधित बच्चों के लिए स्कूल का निर्माण किए जाने की योजना थी। यह जान कर बहुत अच्छा लगा था। बाकी हिस्से के बारे में पता चला कि वहां एक विशाल स्टेडियम बनने जा रहा है, राष्ट्रीय स्तर का। घबरा कर मैंने पैरों के नीचे वाली कच्ची अनगढ़ भूमि पर अपना ध्यान केंद्रित किया।

इधर-उधर सूखी लकड़ियों और गोबर की खाद के ढेर दिखे। सूखने के लिए रखे उपलों की लंबी कतारें और उन्हें सहेजने के लिए जगह-जगह खड़े किए गए कई खूबसूरत ‘गीरे’ भी दिखाई दिए। दो-चार ग्रामीण महिलाएं और पुरुष लकड़ियां बीनने और उपलों को इकट्ठा करने में व्यस्त थे। यहां स्टेडियम बन जाएगा तो ग्राम्य-जीवन के ये बचे-खुचे परिदृश्य शायद हमेशा के लिए लुप्त हो जाएंगे! मैंने एक बार पीठ मोड़ कर व्यस्त सड़क पर भागती गाड़ियों और बड़ी-बड़ी इमारतों की ओर दृष्टि घुमाई और सोच में पड़ गई कि यह इतना सारा विकास किसी भूमि-अधिग्रहण की प्रक्रिया के अंतर्गत हुआ होगा या फिर अन्नदाता किसान की खेती-बाड़ी से विमुक्तिकरण की चाह के कारण? एक अस्पष्ट-सा सवाल खुद से किया और उसका उत्तर भी खुद से पाया कि तनाव मत लो, समय बदल गया है, इसलिए मनुष्य के सरोकार भी बदल गए हैं।

 

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