jansatta editorial about verda storm - Jansatta
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तूफान के निशान

देश ने समुद्री लहरों का सबसे भयानक कोप दिसंबर 2004 में देखा, जब सुनामी ने दक्षिण भारत के साथ-साथ श्रीलंका और इंडोनेशिया पर भी कहर बरपाया था।

Author December 14, 2016 2:25 AM
तमिलनाड़ु में तीव्र रफ्तार वाले चक्रवाती तूफान वरदा ने दस्तक दी है। (Photo-Twitter)

प्राकृतिक आपदा को रोका नहीं जा सकता। पर उसके कहर को कम जरूर किया जा सकता है, और जाहिर है, यह निर्णायक रूप से पूर्व-सूचना तथा पूर्व-तैयारी पर निर्भर करता है। ‘वरदा’ तूफान से, पूर्व के अनुभवों की तुलना में, जान-माल का कम नुकसान हुआ, तो इसका बड़ा कारण चेतावनी प्रणाली का विकास है। तूफान के आने की सूचना समय से लोगों तक पहुंचा दी गई थी और सरकारों ने भी अपनी तैयारी कर ली थी। सोमवार को दोपहर बाद जब वरदा नामक समुद्री तूफान तमिलनाडु के तट से टकराया, उसके पहले राज्य सरकार ने कोई दस हजार लोगों को तटीय क्षेत्र से हटा कर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचा दिया था। इसी तरह आंध्र प्रदेश की सरकार ने भी हजारों लोगों को तटीय क्षेत्र से दूर पहुंचा दिया था। मछुआरों समेत तटीय इलाकों में रहने वाले सारे लोगों को तूफान के बारे में आगाह कर दिया गया था। केंद्रीय आपदा रक्षक बल के कई दस्तों और सेना की कई टुकड़ियों को आपात-सहायता के लिए पहले ही बुला लिया गया था। अभी तक तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में तूफान के चलते कुल मिलाकर दस लोगों के मारे जाने की खबर है। क्या पता यह तादाद कहीं ज्यादा होती, अगर वरदा से निपटने की पूर्व-तैयारी न हो पाती।

हाल के इतिहास में जिस सबसे भयंकर चक्रवात की याद लोगों को है वह 1999 में ओड़िशा में आया था। जब वह चक्रवात जगतसिंहपुर जिले के पारादीप बंदरगाह से टकराया तो उसकी गति करीब ढाई सौ किलोमीटर प्रतिघंटा थी। उस तूफान ने भयावह तबाही मचाई थी। हजारों लोग मारे गए और लाखोें घर उजड़ गए थे। उसके मुकाबले वरदा की रफ्तार काफी कम थी, सवा सौ से डेढ़ सौ किलोमीटर के बीच। पर जान-माल का नुकसान अपेक्षया कम हुआ तो इसकी वजह तूफान की गति कम होने के अलावा बरती गई सतर्कता भी थी। ओड़िशा के चक्रवाती तूफान के बाद देश ने समुद्री लहरों का सबसे भयानक कोप दिसंबर 2004 में देखा, जब सुनामी ने दक्षिण भारत के साथ-साथ श्रीलंका और इंडोनेशिया पर भी कहर बरपाया था। उसी के बाद चेतावनी प्रणाली विकसित करने पर तेजी से काम चला। फिर, अंतरिक्ष कार्यक्रम में हुई प्रगति से इसमें और मदद मिली। अब मौसम संबंधी भविष्यवाणियां पहले से ज्यादा प्रामाणिक होने लगी हैं। चक्रवाती तूफान के साथ अक्सर भारी बारिश भी होती है। तूफान, तेज हवाओं और भारी बारिश ने चेन्नई तथा चित्तूर समेत तमिलनाडु और आंध्र के कई तटीय जिलों में बहुत सारे पेड़ और मकान ढहा दिए हैं।

यों चेन्नई हवाई अड््डे से विमानों के उड़ान भरने का क्रम फिर से चालू हो गया है, और गिरे हुए पेड़ हटा कर कई प्रमुख रास्ते फिर से आवागमन के लिए खोल दिए गए हैं। पर कई रास्ते अब भी बंद हैं और कुछ इलाकों में बिजली की आपूर्ति फिलहाल ठप है। सामान्य स्थिति बहाल होने में अभी वक्त लग सकता है। वरदा की पूर्व सूचना मिल जाने और बचाव की पूर्व तैयारी हो जाने पर लोगों ने राहत की सांस ली है। पर तूफान की मारकता और कम हो सकती थी अगर समुद्रतटीय वनों को नष्ट नहीं किया गया होता। सुनामी के समय यह देखा गया था कि जहां मैंग्रोव वन थे वहां कम तबाही हुई। लेकिन विडंबना यह है कि सुनामी के भीषण अनुभव के बाद भी मैंग्रोव वनों को बचाने का कोई खास प्रयास शुरू नहीं हो पाया, और यह कोताही अब भी जारी है।

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