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हादसोें का सफर

पटरियोें को काटने के बाद बिना वेल्डिंग के छोड़ दिया गया था, उस पर तेज रफ्तार से गुजरती हुई उत्कल एक्सप्रेस के डिब्बे दुर्घटनाग्रस्त हो गए।

उत्कल एक्सप्रेस हादसा: हादसा पुरी-हरिद्वार ट्रेन के साथ हुआ था।

सुरक्षा उपायों पर अमल के मामले में रेलवे महकमा बरसों से लापरवाह साबित होता आ रहा है। इसी का नतीजा है कि थोड़े-थोड़े अंतराल पर कई बड़े हादसे हो चुके हैं। मुजफ्फरनगर के खतौली में पुरी-हरिद्वार उत्कल एक्सप्रेस के तेरह डिब्बोें का पटरी से उतर जाना और उसमें बीस से ऊपर लोगोें के मारे जाने और करीब साठ के घायल हो जाने की घटना इसकी ताजा कड़ी है। इस घटना की प्राथमिक जांच के बाद खुद रेल अधिकारियोें ने स्वीकार किया है कि पटरियोें की मरम्मत करने वाले दस्ते और स्टेशन कर्मियों के बीच सही तालमेल न रहने के कारण यह हादसा हुआ होगा। खतौली स्टेशन के पास पटरियोें की मरम्मत का काम चल रहा था। घटनास्थल पर लाल झंडा और मरम्मत में इस्तेमाल होने वाले उपकरण मिले हैं। बताया जा रहा है कि पटरियोें को काटने के बाद बिना वेल्डिंग के छोड़ दिया गया था, उस पर तेज रफ्तार से गुजरती हुई उत्कल एक्सप्रेस के डिब्बे दुर्घटनाग्रस्त हो गए। मरम्मत करने वाले दस्ते का कहना है कि उसने खतौली स्टेशन पर मरम्मत संबंधी सूचना दी थी, जबकि स्टेशन सुपरिटेंडेंट ने इस बात से इनकार किया है कि उन्हें इस बात की कोई जानकारी थी। खैर, रेलवे ने मामले की गहन जांच के बाद दोषियोें को दंडित करने का भरोसा दिलाया है।

इस हादसे के बाद केंद्र में प्रमुख विपक्षी कांग्रेस को सरकार पर हमला बोलने का मौका मिल गया है। उसका कहना है कि भाजपा सरकार के तीन सालोें में सत्ताईस बड़े रेल हादसे हो चुके हैं। आखिर सरकार रेल सुरक्षा के मामले में इतनी लापरवाही क्योें बरत रही है। जब भी कोई बड़ा हादसा होता है, रेल महकमा सुरक्षा उपायोें पर अमल के बड़े-बड़े वादे करता है, पर हकीकत यही है कि जल्दी ही उन्हें भुला दिया जाता है। सरकार इस बात से आंख नहीं फेर सकती कि रेल संचालन से संबंधित जितनी शिकायतें और उन पर जैसी निष्क्रियता पिछले तीन सालोें में देखने को मिली है, उतनी शायद पहले कभी नहीं देखी गई। रेलवे में सुधार के तर्क पर रेल बजट को भी आम बजट के साथ जोड़ दिया गया। मगर इस दिशा में कोई उल्लेखनीय पहल नहीं देखी जा रही।

रेल हादसोें को रोकने के लिए रेलोें में टक्कररोधी उपकरण लगाने और रेल संचालन में अत्याधुनिक कंप्यूटरीकृत यंत्रों के उपयोग का खाका बरसों पहले खींचा गया था। हर बजट में रेलों को साफ-सुथरा, आरामदेह और सुविधाजनक बनाने का दावा किया जाता है। मगर सुरक्षा के मामले में कोई उल्लेखनीय काम नहीं हो पाया है। योें गाड़ियोें को समय से चलाने और पहुंचाने, तेज रफ्तार गाड़ियां चलाने और रेलवे को विश्व मानकोें के अनुरूप ढालने का सपना दिखाया जाता है। मोदी सरकार ने तो बुलेट ट्रेन का नक्शा भी खींच रखा है। मगर जहां दो-तीन किलोमीटर पर मरम्मत करने वाले दस्ते और स्टेशनकमिर्यों के बीच उचित तालमेल नहीं बैठ पाता हो, वहां ऐसे सपनोें के साकार होने की भला कितनी उम्मीद की जा सकती है। तथ्य है कि अधिकतर रेल लाइनें और रेलवे पुल कब का अपनी मियाद पूरी कर चुके हैं, पर उन्हें दुरुस्त करने का काम नहीं हो पाता। उन पर हर साल कुछ नई रेलोें का बोझ डाल दिया जाता है। सिग्नल और पटरियां बदलने की व्यवस्था आज भी हाथ से संचालित है। इन तमाम पहलुओें पर ध्यान दिए बगैर सरकार रेल संचालन में सुधार और हादसोें पर काबू पाने का संकल्प पूरा नहीं कर सकती।

 

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