ताज़ा खबर
 

फैसले के मायने

देश की सर्वोच्च अदालत के इस फैसले ने परंपरा या प्रथा को दरकिनार करके पुरुष के बरक्स स्त्री के समान अधिकार पर मुहर लगाई है।

Author August 23, 2017 5:20 AM
मुस्लिम महिलाएं।

तीन तलाक के मसले पर मंगलवार को आया उच्चतम न्यायालय का फैसला संविधान के बुनियादी आधारों और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप है, और इसका स्वागत किया जाना चाहिए। इस ऐतिहासिक फैसले में न्यायालय ने मुसलिम समाज में ‘तीन तलाक’ के चलन को असंवैधानिक ठहराया है। अब तीन बार तलाक बोल कर तलाक देने की मुसलिम पुरुषों को जो बेहद मनमानी भरी छूट हासिल थी वह नहीं चलेगी। यह साफतौर पर मुसलिम महिलाओं की जीत है। यह फैसला उनमें समानता का अहसास जगाएगा और उनके सशक्तीकरण के काम आएगा। और भी व्यापक रूप में देखें, तो यह सभी महिलाओं की जीत है, चाहे वे किसी भी धर्म को मानने वाली हों, क्योंकि देश की सर्वोच्च अदालत के इस फैसले ने परंपरा या प्रथा को दरकिनार करके पुरुष के बरक्स स्त्री के समान अधिकार पर मुहर लगाई है। यों यह फैसला सर्वसम्मति से नहीं आया। सुनवाई कर रहे पीठ में दो जजों की असहमति थी, जिनमें मुख्य न्यायाधीश भी थे।

HOT DEALS
  • Apple iPhone 6 32 GB Space Grey
    ₹ 24890 MRP ₹ 30780 -19%
    ₹3750 Cashback
  • Coolpad Cool C1 C103 64 GB (Gold)
    ₹ 11290 MRP ₹ 15999 -29%
    ₹1129 Cashback

दरअसल, यह हमेशा एक विवादास्पद मसला रहा है, इसलिए आश्चर्य नहीं कि पांच जजों के पीठ में सर्वसम्मति नहीं बन पाई। बहरहाल, यह गौरतलब है कि अदालत ने तीन तलाक को संविधान के अनुच्छेद 14 के आधार पर असंवैधानिक ठहराया है। यह अनुच्छेद कानून के समक्ष समानता का भरोसा दिलाता है
तीन तलाक प्रथा को अदालत में चुनौती कई मुसलिम महिलाओं ने दी थी। उनका संघर्ष रंग लाया। पर मामला तार्किक परिणति तक पहुंच सका, तो इसके कुछ और भी कारण थे। तीन तलाक प्रथा के खिलाफ मुसलिम समाज के भीतर से भी आवाज उठने लगी थी। अलबत्ता आॅल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड अब भी अपनी पुरानी रट लगाए हुए था कि तीन तलाक का मसला मजहब से जुड़ा हुआ है और इसमें सरकार या अदालत की ओर से कोई दखल दिया जाना, धार्मिक आजादी के खिलाफ होगा, जिसकी गारंटी संविधान ने दे रखी है। इस मामले को सर्वोच्च अदालत ने काफी गंभीरता से लिया, जिसका अंदाजा इसी से लग जाता है कि उसने मई में कुछ दिन तक रोजाना सुनवाई की और याचिकाकर्ताओं के अलावा केंद्र सरकार तथा आॅल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड के भी पक्ष सुने। फैसले ने केंद्र के इस रुख की पुष्टि की है कि तीन तलाक का मसला इस्लामी नहीं है, बल्कि यह मुसलिम महिलाओं को अन्याय से बचाने और उनके अधिकारों की रक्षा का मसला है। अब केंद्र के ऊपर फैसले के अनुरूप विधायी पहल करने की जिम्मेदारी होगी।

शनि शिंगणापुर और हाजी अली की दरगाह में प्रवेश के मामलों में सुनवाई करते हुए मुुंबई उच्च न्यायालय ने भी कानून के समक्ष समानता के संवैधानिक सिद्धांत की याद दिलाई थी। इसका यह अर्थ नहीं कि हमारे संविधान ने धार्मिक स्वायत्तता को कोई खास अहमियत नहीं दी है। दी है, पर उसी हद तक जब तक वह किसी मौलिक नागरिक अधिकार के आड़े न आए। आॅल इंडिया मुसलिम पसर्नल लॉ बोर्ड भी जानता था कि वह संवैधानिक आधार पर तीन तलाक को वाजिब नहीं ठहरा सकता, इसलिए उसने मुसलिम महिलाओं के हितों का ध्यान रखने के लिए ‘निकाहनामा’ में कुछ नई बातें जोड़ने की पेशकश की थी। पर अदालत ने इस तरह के पचड़े में पड़ने के बजाय संविधान की आत्मा की आवाज सुनी। इस फैसले से बोर्ड को कुछ सबक लेना चाहिए, समझना चाहिए कि संविधान सर्वोपरि है। उम्मीद की जानी चाहिए कि सर्वोच्च अदालत का यह फैसला मुसलिम समाज में एक नई जागृति का सबब बनेगा।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App