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बीच बहस में

तीन तलाक, निकाह हलाला और बहु-विवाह संवैधानिक हैं या नहीं, इस पर अदालत का संविधान पीठ ग्यारह मई से सुनवाई करेगा।

सर्वोच्च न्यायालय ने ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) से पूछा कि क्या महिलाओं को निकाह के लिए अपनी सहमति देने से पहले यह अधिकार दिया जा सकता है कि तीन तलाक से शादी तोड़ने को वह नकार दे।

एक बार फिर तीन तलाक का मसला चर्चा का विषय बन गया है। इस पर एक ही दिन दो अलग-अलग शीर्ष स्तर के बयान आए। एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि तीन तलाक की कुप्रथा बंद होनी चाहिए। दूसरी तरफ आॅल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा कि तलाक का मामला शरीअत से ही चलेगा; मुसलिम शरीआ कानूनों में दखल बर्दाश्त नहीं करेंगे। मगर यह गौरतलब है कि सरकार और मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड, दोनों के रुख में पहले के मुकाबले कुछ बदलाव आया है। सरकार पहले जहां बोर्ड के रुख के साथ या खामोश रहती थी, वहीं अब वह तीन तलाक का खुल कर विरोध कर रही है। सर्वोच्च न्यायालय में दायर किए अपने हलफनामे में केंद्र सरकार पहले ही कह चुकी है कि ‘तीन तलाक, निकाह हलाला और बहु-विवाह का इस्लाम में रिवाज नहीं है। तीन तलाक महिलाओं की गरिमा के खिलाफ है। कई मुसलिम देशों में इस बारे में बड़े सुधार हो चुके हैं।’ अगर केंद्र में भाजपा सत्तासीन न होती, तो शायद सरकार की तरफ से ऐसा हलफनामा न आता। लेकिन अब तीन तलाक प्रथा के खिलाफ खुद मुसलिम समाज के भीतर से भी आवाज उठने लगी है, जिसकी अगुआई भारतीय मुसलिम महिला आंदोलन करता है। इस मामले में सर्वोच्च अदालत में कुछ मुसलिम महिलाओं की तरफ से दायर याचिकाएं भी गवाह हैं। सर्वोच्च अदालत ने भी इसमें दिलचस्पी दिखाई है।

तीन तलाक, निकाह हलाला और बहु-विवाह संवैधानिक हैं या नहीं, इस पर अदालत का संविधान पीठ ग्यारह मई से सुनवाई करेगा। यह भी गौरतलब है कि मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड का रवैया अब पहले जितना कठोर नहीं दिखता। एक समय बोर्ड ने बाकायदा प्रस्ताव पारित कर कहा था कि निजी कानून न्यायिक समीक्षा से परे हैं। पर उसी बोर्ड ने अपनी कार्यकारिणी की बैठक में प्रस्ताव पारित कर तलाक के लिए पहली बार आचार संहिता जारी की है और आह्वान किया है कि एक साथ तीन तलाक कह कर अपनी बीवी को छोड़ देने वाले मर्दों का मुसलिम समाज सामाजिक बहिष्कार करे। अलबत्ता बोर्ड अब भी यही मानता है कि मुसलिम निजी कानून में फेरबदल की कोई जरूरत नहीं है। यही नहीं, अगर बोर्ड के पहले के बयानों को देखें तो वह निजी कानून में फेरबदल को धार्मिक स्वायत्तता में दखलंदाजी मानता है। बोर्ड की यह दलील अपनी जगह सही है कि हमारे संविधान ने धार्मिक आजादी या धार्मिक स्वायत्तता की गारंटी दे रखी है, लेकिन जैसा कि बीते दिसंबर में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भी कहा था, धार्मिक आजादी असीमित नहीं है, वह संविधान में वर्णित नागरिक अधिकारों का अतिक्रमण नहीं कर सकती।

हमारे संविधान ने कानून के समक्ष समानता के सिद्धांत व अधिकार को माना है। ऐसे में तीन तलाक का कानूनी औचित्य कैसे ठहराया जा सकता है, जो मुसलिम महिलाओं के बरक्स मुसलिम पुरुषों को एकतरफा और मनमाने निर्णय का अधिकार देता है? शनि शिंगणापुर और हाजी अली की दरगाह में महिलाओं के प्रवेश पर चली आ रही पाबंदी हटाते हुए मुंबई उच्च न्यायालय ने भी यही कहा था कि बेशक संविधान ने सभी समुदायों को धार्मिक स्वायत्तता की गारंटी दी हुई है, पर धार्मिक स्वायत्तता का यह अर्थ नहीं है कि वह नागरिक अधिकारों के आड़े आए। इसी तरह, मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड को मुसलिम समाज के भीतर चाहे जितना समर्थन और मान-सम्मान प्राप्त हो, वह संविधान से ऊपर नहीं है। कई मुसलिम बहुल देशों में मुसलिम निजी कानून में बदलाव हुए हैं तथा उन्हें अधिक से अधिक प्रासंगिक बनाने की कोशिश हुई है। भारत में ऐसा क्यों नहीं हो सकता!

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