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संपादकीय: बीच बहस में

धर्म-विशेष के आंतरिक मामले में दखलंदाजी न करने की गुजारिश शनि शिंगणापुर के मामले में भी की गई थी और हाजी अली की दरगाह के मामले में भी।
Author October 10, 2016 05:11 am
( फाइल फोटो)

यह शायद पहली बार हुआ कि केंद्र ने तीन तलाक, ‘निकाह हलाला’ और बहुविवाह प्रथा का सर्वोच्च अदालत में विरोध किया है। गौरतलब है कि इन प्रथाओं को चुनौती देते हुए दायर की गई कुछ याचिकाओं पर अदालत में कई महीनों से बहस चल रही है। इसी सिलसिले में अदालत ने केंद्र से अपना पक्ष रखने को कहा था। केंद्र का रुख, जाहिर है, मुसलिम समाज की कई ताकतवर संस्थाओं को रास नहीं आएगा। मसलन, आॅल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड इसी मामले में अपना पक्ष अदालत में रख चुका है, जिसमें उसने इस मुद््दे पर अदालती सुनवाई का विरोध किया था। बोर्ड के मुख्यत: दो तर्क थे।

एक यह कि इस मसले का निपटारा सुप्रीम कोर्ट के पहले के एक फैसले में हो चुका है, इसलिए इस पर नए सिरे से सुनवाई का कोई औचित्य नहीं है। दूसरी खास दलील यह थी कि यह एक धर्म-विशेष का आंतरिक मामला है, इसलिए यह न्यायपालिका के अधिकार-क्षेत्र से बाहर है। सही है कि सुप्रीम कोर्ट पहले एक बार फैसला सुना चुका है। पर चूंकि अब मुसलिम समाज के भीतर से भी तीन तलाक और बहुविवाह के खिलाफ आवाज उठ रही है, इसलिए अदालत को लगा होगा कि इस मसले पर नए सिरे से सुनवाई करने में कोई हर्ज नहीं है। याचिका कुछ मुसलिम महिलाओं ने ही दायर की है। हां, पहले के फैसले को देखते हुए अच्छा होगा कि इस मामले को पांच सदस्यों की संविधान पीठ को सौंप दिया जाए।

धर्म-विशेष के आंतरिक मामले में दखलंदाजी न करने की गुजारिश शनि शिंगणापुर के मामले में भी की गई थी और हाजी अली की दरगाह के मामले में भी। दोनों मामलों में संबंधित स्थलों के प्रबंधकों की इस दलील को अदालत ने खारिज कर दिया कि वहां स्त्रियों के प्रवेश पर चली आ रही पाबंदी धर्म-सम्मत है और इस पाबंदी को हटाना धार्मिक स्वायत्तता का हनन होगा। दरअसल, धार्मिक स्वायत्तता की एक सीमा है, वह उन बुनियादी अधिकारों को नहीं छीन सकती जो संविधान ने देश के सभी नागरिकों को दिए हैं। केंद्र ने अपने हलफनामे में इसी आधार पर तीन तलाक और बहुविवाह का विरोध किया है कि ये प्रथाएं संविधान के अनुच्छेद चौदह और अनुच्छेद पंद्रह से कतई मेल नहीं खातीं। इन अनुच्छेदों में गरिमापूर्ण ढंग से जीने के अधिकार और कानून के समक्ष समानता के अधिकार की गारंटी दी गई है। लिहाजा, आॅल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसी संस्थाओं को चाहिए कि इन संवैधानिक प्रावधानों की रोशनी में अपने पुराने रुख पर फिर से सोचें। अनेक मुसलिम बहुल देशों ने मुसलिम पसर्नल लॉ में वक्त की जरूरत महसूस कर बदलाव किए हैं। इससे इस्लाम पर कोई आंच नहीं आई। अलबत्ता वे कानून अधिक मानवीय तथा लोकतांत्रिक बने। भारत में ऐसा क्यों नहीं हो सकता!

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