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संपादकीय: हादसे की पटरी

ऐसी दुर्घटनाएं आमतौर पर पटरियों के उखड़ने या फिर पहियों में खराबी आने की वजह से होती हैं।

Author November 21, 2016 2:53 AM
ट्रन हादसे के दौरान की तस्वीर। (file photo)

इंदौर-पटना एक्सप्रेस ट्रेन के दुर्घटनाग्रस्त हो जाने से एक बार फिर रेल सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं। इसमें करीब सवा सौ लोग मारे गए और दो सौ से ज्यादा घायल हो गए। यह हादसा रात के करीब साढ़े तीन बजे हुआ। उस वक्त ज्यादातर मुसाफिर सो रहे थे। रात का घना अंधेरा था और जिस जगह यह हादसा हुआ वह सुनसान इलाका था। ऐसे में अफरातफरी का अंदाजा लगाया जा सकता है। अभी दुर्घटना की असली वजह पता नहीं चल पाई है। इसकी जांच के आदेश दे दिए गए हैं और अगले दो दिनों में इसकी जानकारी मिलने की उम्मीद है। मगर दुर्घटना की प्रकृति को देखते हुए सहज ही कुछ खामियों का अनुमान लगाया जा सकता है। गाड़ी के बीच के डिब्बे बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुए हैं और ज्यादातर इन्हीं डिब्बों में सवार लोग मारे गए या घायल हुए। आगे और पीछे के डिब्बे ठीकठाक हालत में हैं। इसलिए आशंका जताई जा रही है कि बीच के डिब्बों में से किसी में कोई गंभीर खराबी रही होगी। कुछ मुसाफिरों का कहना है कि एक डिब्बे के पहियों में कुछ आवाज आ रही थी, जिसकी तरफ उन्होंने रेलकर्मियों को ध्यान भी दिलाया, मगर उसे नजरअंदाज कर दिया गया।

ऐसी दुर्घटनाएं आमतौर पर पटरियों के उखड़ने या फिर पहियों में खराबी आने की वजह से होती हैं। रेल महकमा इससे अनजान नहीं है। मगर इस मामले में प्राय: लापरवाही बरती जाती है। स्टेशनों के आसपास की पटरियों की नियमित जांच तो होती रहती है, पर दूर-दराज की जगहों पर मुस्तैदी प्राय: नहीं दिखाई जाती। तेज रफ्तार गाड़ियों के गुजरने से अक्सर पटरियों की फिश-प्लेटें खिसकने की शिकायत मिलती है। वैसे भी यात्रियों का दबाव कम करने के लिए देश की ज्यादातर रेल लाइनों पर क्षमता से अधिक गाड़ियों का बोझ रहता है। इसलिए उनकी देखभाल, मरम्मत आदि में अधिक सतर्कता की जरूरत होती है, मगर इस मामले में अक्सर लापरवाही देखी जाती है। इसी का नतीजा है कि रेल हादसों पर रोक लगाना मुश्किल बना हुआ है।

हर साल बजट में रेल सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करने और यात्री सुविधाएं बढ़ाने का संकल्प दोहराया जाता है। मगर रेल हादसों पर अंकुश लगाने संबंधी जरूरी कदम अब तक नहीं उठाए जा सके हैं। गाड़ियों में टक्कररोधी उपकरण लगाने की योजना बरसों पहले बनी थी, पर अभी तक वह कागजों पर ही सिमटी हुई है। इसी तरह गाड़ियों में आधुनिक संचार उपकरण लगाने की योजना बनी थी, पर इस दिशा में अभी तक पहल नहीं हो पाई है। समझना मुश्किल है कि आज जब हर काम कंप्यूटरीकृत प्रणाली पर निर्भर होता जा रहा है, रेल महकमा गाड़ियों की सुरक्षा के मामले में इसे अपनाने पर गंभीरता से ध्यान क्यों नहीं दे रहा। अगर गाड़ियों में कंप्यूटरीकृत प्रणाली लगाई जाए तो किसी प्रकार की खराबी की स्थिति में तुरंत संकेत प्राप्त किए और सावधानी बरती जा सकती है। इंदौर-पटना एक्सप्रेस के डिब्बों के पहियों या फिर पटरियों में कोई खराबी थी, तो इस प्रणाली से समय रहते पहचान लिया जाता। मगर समझना मुश्किल है कि रेलवे आज भी क्यों पुरानी तकनीक और तौर-तरीकोंपर भरोसा करता है। ताजा रेल हादसे में एक बार फिर जांच के आदेश और मुआवजे वगैरह देकर जिम्मेदारियां पूरी समझ ली जाएंगी, पर जब तक सुरक्षा के आधुनिक उपाय नहीं किए जाते, ऐसे हादसों पर अंकुश का भरोसा दिलाना संभव नहीं होगा।

 

 

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