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संपादकीय: हताशा की हरकत

ऐसे समय जब जम्मू-कश्मीर के चप्पे-चप्पे पर कड़ी सतर्कता बरती जा रही हो, कुछ आतंकी एक ऐसी जगह पहुंचने में सफल हो गए, जो श्रीनगर से महज पंद्रह किलोमीटर पर है।
Author October 11, 2016 04:28 am
भारतीय सुरक्षाबलों के लिए आधुनिक असॉल्‍ट राइफल, हेलमेट और कवच जैसी चीजों के लिए खरीदारी का काम शुरू किया गया है। (एक्सप्रेस फोटो-शोएब मसूदी)

सोमवार की सुबह पंपोर में हुए आतंकी हमले के संकेत साफ हैं। ऐसे समय जब जम्मू-कश्मीर के चप्पे-चप्पे पर कड़ी सतर्कता बरती जा रही हो, कुछ आतंकी एक ऐसी जगह पहुंचने में सफल हो गए, जो श्रीनगर से महज पंद्रह किलोमीटर पर है। इससे जाहिर होता है कि आतंकी सीमापार से लगातार घुसपैठ और वारदात करने की फिराक में हैं। पंपोर की घटना भारतीय सेना के लक्षित हमले यानी ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ के दो हफ्ते बाद हुई है। इससे एक बार फिर इस अनुमान की पुष्टि हुई है कि भारतीय सेना की कार्रवाई के जवाब में पाकिस्तान की ओर से या आतंकवादी संगठनों की ओर से कुछ ऐसा हो सकता है जो बदला लेने का आभास देता हो, यह जताता हो कि वे न हताश हुए न उन्होंने हार मानी है।

इसी अनुमान के आधार पर खुफिया एजेंसियां जम्मू-कश्मीर में सेना या सीआरपीएफ या पुलिस के ठिकानों पर आतंकी हमले की चेतावनी दे रही थीं। उनकी आशंका सही निकली। अलबत्ता वक्त और स्थान के बारे में कोई सटीक अनुमान नहीं था। ऐसा अमूमन तभी हो पाता है जब षड्यंत्रकारियों या हमलावरों की आपसी बातचीत पकड़ी जा सके। पंपोर झेलम नदी के किनारे बसा है। ताजा घटना में हमलावर नाव के जरिए पंपोर में घुसे और उद्यमिता विकास संस्थान के छात्रावास में जा घुसे, जो कि पिछले तीन महीनों से चल रही अशांति के चलते खाली है। फिर वहां आग लगा दी। शायद यह सोच कर कि आग देख कर पुलिसकर्मी उस तरफ दौड़ेंगे और तब उन्हें आसानी से निशाना बनाया जा सकेगा। आग देख स्वाभाविक ही दमकल विभाग के कर्मी उस तरफ दौड़े। छिपे आतंकियों ने उन पर ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी। फिर फौरन सुरक्षा बलों ने उस भवन को घेर लिया और मुठभेड़ शुरू हो गई। फरवरी में भी इसी परिसर के मुख्य भवन में कुछ आतंकी जा छिपे थे। तब हुई मुठभेड़ तीन दिन तक चली थी।

इस तरह की मुठभेड़ का हश्र आतंकी और उनके आका भी जानते हैं। फिर, वे क्यों ऐसी हिमाकत करते हैं? दरअसल, इसके पीछे उनका इरादा यही रहता है कि घाटी के माहौल को बिगाड़ा जाए, और दूसरे, कश्मीर मसले की तरफ दुनिया का ध्यान आकर्षित हो। ताजा घुसपैठ के पीछे ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ का जवाब देने की भी मंशा रही होगी। खबर है कि पखवाड़े भर पहले की गई भारत की इस सैन्य कार्रवाई के चलते सबसे ज्यादा नुकसान लश्कर-ए-तैयबा को हुआ। फिलहाल यह साफ नहीं है कि पंपोर हमले को लश्कर ने अंजाम दिया या किसी और आतंकी गुट ने। जो हो, यह घटना सीमा पर सतर्क निगरानी की जरूरत को रेखांकित करती है, जिसमें नदी के रास्ते भी शामिल हैं। पिछले हफ्ते गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने जयपुर में जम्मू-कश्मीर, पंजाब, राजस्थान और गुजरात के मुख्यमंत्रियों और आला अफसरों की बैठक के बाद कहा कि उनका लक्ष्य 2018 तक इन राज्यों से लगी अंतरराष्ट्रीय सरहद को सील करने का है।

इन राज्यों की कुल तेईस सौ किलोमीटर की सीमा पाकिस्तान से लगती है। इनमें से काफी हिस्सा सील किया जा चुका है। कुछ इलाके ऐसे हैं जहां रेगिस्तान या रेतीले टापू बनते-बिगड़ते रहने या इसी तरह के किसी और कुदरती कारण से बाड़बंदी मुमकिन नहीं है। ऐसी जगह निगरानी और चौकसी बढ़ाना ही उपाय है। यही नियंत्रण रेखा पर भी करना होगा, जहां ऊंचे या दुर्गम पहाड़ हैं या नदी का बहाव है। ताजा साजिश को सुरक्षा बलों ने भले नाकाम कर दिया हो, पर ऐसे और भी खतरों से इनकार नहीं किया जा सकता।

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